12th Sociology Long Question Answer 2024 in Hindi | BSEB Class 12 Sociology Question Papers PDF Download

12th Sociology Long Question Answer 2024 in Hindi :- यदि आप लोग  Class 12 Exam 2024 Sociology Subjective Question की तैयारी कर रहे हैं तो यहां पर आपको Class 12th Sociology Long Question Answer2024  in Hindi का महत्वपूर्ण प्रश्न दिया गया है | Sociology Question Answer in hindi 12th

10th & 12th Question PDF

12th Sociology Long Question Answer 2024 in hindi 

1. भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालें।

उत्तर  संस्कृतीकरण की प्रक्रिया भारत के लिए नवीन नहीं है। वह किसी न किसी रूप में अति प्राचीन काल से भारतीय समाज को प्रभावित करती रही है। इस अवधारणा को सर्वप्रथम डॉ० श्रीनिवास ने अपनी पुस्तक (Religion and Society among the Coorgs of South India) में जाति को गतिशीलता की प्रक्रिया को व्यक्त करने हेतु संस्कृतीकरण के प्रत्यय का प्रयोग किया।

श्रीनिवास ने संस्कृतीकरण को प्रारंभ में परिभाषित करते हुए कहा कि, “एक जाति एक या दो पीढ़ियों में शाकाहारी बनकर मद्यपान को छोड़कर तथा अपने कर्मकाण्ड अथवा अपने देवगण का संस्कृतीकरण कर संस्तरण की प्रणाली में अपनी स्थिति ऊँची उठाने में समर्थ हो जाती है। बाद में अपनी परिभाषा में संशोधन करते हुए श्रीनिवास ने विचार दिया कि, “संस्कृतीकरण वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा कोई निम्न हिन्दू जाति या जनजाति अथवा कोई अन्य समूह किसी उच्च और प्रायः द्विज जाति को दिशा में अपने रीति-रिवाज, कर्मकाण्ड विचारधारा और पद्धति को बदलता है। सामान्यतः ऐसे परिवर्तनों के बाद निम्न जाति, जातीय संस्तरण की प्रणाली में, स्थानीय समुदाय में उसे परम्परागत रूप से जो स्थिति प्राप्त है, उससे उच्च स्थिति का दावा करने लगती है। सामान्यतः बहुत दिनों तक बल्कि वास्तव में एक दो पीढ़ियों तक दावा किये जाने के बाद ही उसे स्वीकृति मिलती है।

इस अवधारणा को आर्थिक एवं राजनीतिक प्रभुत्व से जोड़ दिया गया है। जिन जातियों को आर्थिक एवं राजनैतिक शक्ति प्राप्त थी लेकिन संस्कारों की दृष्टि से उनकी स्थिति ऊँची नहीं थी, उन जातियों में कभी-न-कभी संस्कृतीकरण अवश्य होता था। संस्कृतीकरण दुहरी प्रक्रिया है, जिसमें निम्न जाति उच्च जाति से कुछ ‘प्राप्त’ करने के साथ-साथ उसे कुछ प्रदान भी करती है।


2. हिन्दू विवाह के विभिन्न स्वरूपों की विवेचना करें।

उत्तर ⇒  हिन्दू विवाह के विभिन्न प्रकार—

(क) अनुलोम विवाह — यह हिन्दू विवाह का एक रूप है। प्राचीन भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत अनुलोम विवाह को सामाजिक मान्यता थी। इसे कुलीन विवाह भी कहा जाता है। धार्मिक पुस्तकों में यह उल्लेख मिलता है कि “पिता को अपनी कन्या का विवाह अपने से उच्च कुल में करना चाहिए।” कन्या का विवाह उच्च वर्ण में और लड़के का विवाह अपने नीचे वर्ण की लड़की से होता है तो उसे अनुलोम विवाह कहा जाता है।” जैसे ब्राह्मण लड़का, क्षत्रिय या वैश्य या शुद्र लड़की से विवाह करता है तो यह अनुलोम विवाह है।

(ख) प्रतिलोम विवाह “निम्न वर्ण के लड़के का विवाह उच्च वर्ण की लड़की से होना प्रतिलोम विवाह कहलाया।” दूसरे शब्दों में, यह कह सकते हैं कि उच्च वर्ण की लड़की का विवाह निम्न वर्ण के लड़के से प्रतिलोम विवाह है। ऐसे विवाह को प्राचीन भारत समाज में वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत सामाजिक मान्यता नहीं थी।

 (ग) क्रय विवाह या कन्यामूल्य — कई समाजों में लड़की को खरीदकर विवाह करने की प्रथा है। लड़की को पत्नी के रूप में पाने के लिए उसके माता-पिता को दिया गया धन ही कन्या मूल्य कहलाता है। प्राचीन अरबी समाज में सदक’ का चलन था। लड़की के माता-पिता लड़का से कन्यामूल्य (सदक) लेकर अपनी लड़की का उससे विवाह करते थे तथा ‘सदक’ को वापस कर अपनी लड़की को उसके पिता से अलग कर अपने पास ले आते थे। हिन्दू समाज में भी कई जातियों को विवाह के लिए लड़की के माता-पिता को धन देना पड़ता है। कन्यामूल्य का सबसे अधिक प्रचलन जनजातियों में है। बहुत सी जनजातियों में कन्यामूल्य चुकाकर विवाह किया जाता है। जिसे क्रय विवाह कहा जाता है।

 (घ) बहुपति विवाह — यह विवाह का एक रूप है। सभ्य समाजों में ऐसे विवाहों का उदाहरण नहीं मिलता है। प्राचीन भारत में हिन्दू समाज में केवल द्रौपदी का उदाहरण है जिसके पाँच पति थे। आज भारत तथा अन्य देशों की कुछ भी जनजातियों में ऐसा विवाह पाया जाता है। यह ऐसा विवाह है जिसमें एक स्त्री कई पुरुषों से विवाह करती है तो यह बहुपति विवाह कहलाता है।

(ङ) बहुपत्नी विवाह — यह विवाह का एक प्रकार है। कई समाजों में ऐसे विवाह का प्रचलन है। जब एक पुरुष दो या दो से अधिक स्त्रियों से विवाह करता है तो यह बहुपली विवाह कहलाता है। हिन्दू समाज में एक पुरुष एक पत्नी के जीवित रहते हुए दूसरी स्त्री से विवाह कर लेता है तो इसे बहुपत्नी विवाह कहते हैं। हिन्दू समाज में ऐसे विवाह के विरूद्ध कानून है, लेकिन मुसलमानों में इसका प्रचलन हैं। इस्लाम धर्म के अनुसार एक मुसलमान को एक साथ चार पत्नियाँ हो सकती है।


3. एक पितृसतात्मक परिवार में प्रजनन संबंधी लिंग भेद की चर्चा करें।

उत्तर ⇒  पितृसतात्मक परिवार में बालक के जन्म से ही लिंग भेदभाव शुरू हो जाता है। प्रत्येक माँ-बाप अपने विचारों के अनुसार संतान पर अपने विचारों को थोपते हैं। जैसे- लड़की के पैदा होने पर ही माँ बाप को वह सुकोमल, सुन्दर और छोटी से दिखाई देती है। जबकि लड़का पैदा होते ही उसे सशक्त बुद्धिमान आदि कहकर प्रकारा जाता है। जब बच्चे बड़े हो जाते हैं। तो वे अपने आप को श्रेष्ठ या निम्न समझने हैं समाज में लड़के • लड़कियों का समाजीकरण भिन्न प्रकार से किया जाता है। लड़कों में आत्मनिर्भरता तथा लड़कियों में समाज निर्भरता आनी चाहिए। इस बात को ध्यान में रखकर बच्चे को समाजीकरण किया जाता है। इसका लड़कियों के आत्मगौरव पर प्रभाव पड़ता है। लड़कियाँ स्वयं को हीन दृष्टि से देखने लगती है। पितृसतात्मक परिवार में लड़कियों को यह महसूस कराया जाता है कि उसका जीवन केवल पुरुषों को उनकी सुंदरता से रिझाने के लिए है। अतः लड़कियों को स्वयं पूर्ण बनने के लिए अवसर नहीं दिया जाता, यहाँ तक कि उसे हमेशा दूसरों पर निर्भर रहने और पुरुषों के रिश्तों के आधार पर रहने की सीख दी जाती है। पितृसतात्मक परिवारों में लड़कियों को लोगों की सेवा करना, उनकी जरूरतों को पूरा करना और नम्रता का व्यवहार करना सिखाया जाता है, जबकि लड़कों को परिवार का आधार घर के महत्वपूर्ण निर्णयों को लेने वाला, घर को नियमित करने वाला आदि बाते कहकर उसके गौरव में वृद्धि की जाती है। इस प्रकार जन्म से लैंगिक भेदभाव प्रारंभ हो जाता है। जो जीवन भर चलता रहता है।


4. विभिन्न कार्यकलापों में बालिकाओं के समक्ष किये जाने वाले भेदभाव पूर्ण व्यवहारों का उल्लेख करें।

उत्तर वैधानिक एवं सैद्धांतिक स्तर पर लैंगिक भेदभाव को दूर कर लिया गया है। लेकिन व्यावहारिक स्तर पर आज भी बालिकाओं के साथ भेद्भाव विभिन्न क्रियाकलापों में किया जाता है।

  लिंग भेदभाव — लड़कियों के साथ जन्म के साथ ही लिंग भेद शुरू हो जाता है। इनके लालन-पालन के तौर तरीके बिल्कुल अलग-अलग है। लड़कों और लड़कियों के जरा बड़ा होते ही अलग-अलग क्षेत्रे में हो जाते हैं। उनके खेल अलग है। पढ़ाई के विषय भी अलग है, सरकार भी अलग है और जीवन की पूरी तैयारी ही अलग-अलग होती है। लड़कों को घर से बाहर का जीव मान जाता है, उसे व्यावसायिक तैयारी करनी होती है, उसे जीवन कठिन प्रतियोगिता के लिए तैयार किया जाता है। जबकि लड़की का जीवन उसके घर की चारदीवारी है, वह रसोईघर के रख-रखाव एवं बच्चों के लालन-पालन के लिए समाजीकृत की जाती है।

शैक्षणिक असमानता परिवार में लड़के-लड़कियों में शिक्षा के प्रति भी भेदभाव पाया जाता है। लड़कों को सभी तरह की शिक्षा के लिए छूट है, वही लड़कियों के संदर्भ में एक खास तरह की शिक्षा दिये जाने की बात की जाती है। आज की ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों की शिक्षा का प्रतिशत निम्न है।

स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी सुविधाओं में असमानता — बचपन से ही लड़कियों को यह पोषक पदार्थ नहीं दिये जाते, जो लड़कों को दिए जाते हैं, उनके खान-पान में भेदभाव रखा जाता है। बीमार पड़ने पर जितना ध्यान लड़कों के ऊपर दिया जाता है, उतना ध्यान लड़कियों पर नहीं दिया जाता है।

इसी तरह से सामाजिक संसर्गा स्थापित करने घूमने फिरने, घरेलू कार्यों के संबंध में भी लड़कियों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किये जाते हैं।

Bihar Board Class 12 Sociology Model Paper 2024


5. परिवार के विभिन्न कार्यों की व्याख्या करें।

उत्तर ⇒  परिवार के कार्यों को निम्नलिखित रूप में देखा जा सकता है

(1) जैविकीय कार्य (Biological function)— परिवार के जैविकीय कार्य को निम्नलिखित रूप में देखा जा सकता है

(i) यौन इच्छा — परिवार सदस्यों के यौन संबंधों की संतुष्टि के लिए नियमबद्ध अवसर प्रदान करता है और इसका उल्लंघन करने वाले व्यक्ति के लिए सामाजिक दण्ड की व्यवस्था करता है।

(ii) संतानोत्पत्ति की व्यवस्था —  प्रत्येक स्त्री और पुरुष में माता अथवा पिता बनने की मूल प्रवृत्ति होती है। व्यक्तित्व के समुचित विकास के लिए इस जैविकीय आवश्यकता की संतुष्टि होना भी आवश्यक है। परिवार बच्चों की उत्पत्ति और उन बच्चों को वैधता प्रदान करता है।

(2) सामाजीकरण का कार्य — परिवार ही एकमात्र ऐसी संस्था है जो बच्चे का सामाजीकरण करती है तथा उसे अपने व्यक्तित्व का विकास करने के लिए सभी आवश्यक गुण प्रदान करती है। इसके महत्त्वपूर्ण कार्य निम्नलिखित हैं

(i) सामाजिक सीख प्रदान करना सामाजिक सीख के द्वारा ही एक जैविकीय प्राणी सामाजिक प्राणी के रूप में परिवर्तित होता है।

(ii) पद तथा कार्य प्रदान करना परिवार सामाजिक ढाँचे में प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति और उसके दायित्वों का निर्धारण करता है तथा अनेक विषमताओं से उसकी रक्षा करता है।

(3) आर्थिक कार्य — परिवार सदैव से आर्थिक क्रियाओं का केन्द्र रहा है। इसके आर्थिक कार्य को निम्न रूप में देखा जा सकता है

(i) सुविधा प्रदान करना —  परिवार एक व्यक्तिवादी इकाई न होकर एक समाजवादी इकाई है जिससे सभी व्यक्तियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उन्हें सुविधा प्रदान की जाती है।

(ii) श्रम विभाजन — परिवार में श्रम विभाजन का कार्य आदिम समाज की भी विशेषता रही है। पुरुष बाहर का कार्य और स्त्रियाँ घर का कार्य करती हैं। उत्पादन के क्षेत्र में परिवार व्यक्ति की कार्यक्षमता के आधार पर उससे कार्य लेता है।

(4) सांस्कृतिक कार्य — संस्कृति को निरन्तरता प्रदान करने, उसे स्थायी रखने तथा प्रभावपूर्ण बनाने में परिवार का योग सबसे अधिक होता है। परिवार सांस्कृतिक व्यवहारों की शिक्षा द्वारा सदस्यों में समान रुचियाँ और मनोवृत्तियाँ उत्पन्न करता है जिससे सामाजिक जीवन को स्थायित्व मिलता है।

(5) धार्मिक कार्य — धार्मिक कार्यों के क्षेत्र में परिवार का बहुत महत्त्व है। प्रत्येक परिवार किसी न किसी धर्म में अवश्य विश्वास करता है और इस धर्म से संबंधित आचरणों और आदर्शों की सीख बच्चों को भी देता है।


6. परिवार की विशेषताओं की चर्चा करें। अथवा, मैकाइवर तथा पेज द्वारा दी गई परिवार की विशेषताओं का उल्लेख करें। 

उत्तर ⇒  परिवार शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के (Famulus) शब्द से हुई है, जिसके अन्तर्गत माता-पिता, बच्चे, नौकर भी सम्मिलित किये जाते हैं। सामान्य तौर पर परिवार में माता-पिता एवं उनके बच्चे सम्मिलित किये जाते हैं। विभिन्न समाज में परिवार के लिए भिन्न-भिन्न शब्दों का प्रयोग होता रहा है। विभिन्न समाजशास्त्रियों ने परिवार की परिभाषा अलग-अलग ढंग से दिया है।

  मेकाइवर और पेज के शब्दों में, “परिवार एक समूह है, जो यौन संबंधों पर आधारित होता है। इसका आकार छोटा होता है और यह बच्चों के जन्म एवं पालन-पोषण की व्यवस्था करता है। ” परिवार की विशेषताएँ (Characteristics of Family)- परिवार की कुछ विशेषताएँ होती हैं, जिनमें प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(i) सार्वभौमिक संस्था — परिवार की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह एक सार्वभौमिक संरचना है। यह व्यक्ति की आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली संस्था है।

(ii) समाज की आधारभूत इकाई परिवार को समाज का छोटा रूप कहा जाता है। यह समाज की मूल तथा आधारभूत इकाई है और समाज की आधारशिला है। परिवार के बिना समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती। व्यक्ति को सामाजिक प्राणी कहा जाता है।

(iii) सीमित आकार — परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई है। इसका आकार बड़ा छोटा होता है, जो केवल दो सदस्यों तक ही सीमित हो सकता है, क्योंकि इसके सदस्य विशेष प्रकार के संबंधों पर आधारित रहते हैं।

(iv) सदस्यों के भावनात्मक संबंध परिवार के सदस्य रेल के डिब्बे में यात्रा करने वाले यात्रियों के समूह के समान नहीं होते। वे एक-दूसरे के साथ भावनात्मक संबंधों से बंधे हुए होते हैं। उनके एक-दूसरे के प्रति प्रेम, सहानुभूति, त्याग, सहयोग, सहायता, सहानुभूति आदि की भावनाएँ विद्यमान रहती है। वे सुख-दुख में एक साथ चलने और एक-दूसरे की सहायता करने के लिए प्रेरित रहते हैं।

(v) सदस्यों का उत्तरदायित्व परिवार में सदस्यों के उत्तरदायित्व की कोई सीमा नहीं हैं। परिवार में उत्तरदायित्व की भावना बहुत ही व्यापक रूप से पाई जाती है। परिवार का प्रत्येक सदस्य एक-दूसरे के लिए हर तरह का कष्ट और परिश्रम करने के लिए तैयार होता है। इस प्रकार परिवार में सदस्यों के बीच असीमित उत्तरदायित्व की भावना पाई जाती है।

(vi) सामाजिक नियंत्रण परिवार सामाजिक नियंत्रण का एक अनौपचारिक साधन है परिवार में बच्चे अपने माता-पिता से समाज के नियमों एवं रीति-रिवाजों से अवगत होते हैं। बच्चे जब समाज के अनुकूल व्यवहार करते हैं तो उनकी सराहना की जाती है और जब प्रतिकूल व्यवहार करते हैं, तो निन्दा की जाती है।


7. संयुक्त परिवार क्या है? इसके गुण एवं दोषों की विवेचना करें। 

उत्तर संयुक्त परिवार उस विस्तृत परिवार को कहा जाता है, जिसमें माता-पिता, दादा-दादी, चाचा-चाची, भाई-भाभी, चचेरे भाई-बहन तथा अविवाहित भाई बहन सम्मिलित होते हैं। इस प्रकार संयुक्त परिवार में कई पीढ़ियों के सदस्यों का एक सामान्य निवास स्थान होता है तथा परिवार के सभी सदस्य एक रसोई का पका भोजन करते हैं एवं सामान्य संपत्ति रखते हैं। संयुक्त परिवार के कुछ गुण भी हैं जिन्हें निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता है।

(i) श्रम विभाजन के लाभ संयुक्त परिवार का प्रत्येक सदस्य अपनी इच्छा और अभिरुचि के अनुसार काम कर सकता है और इस प्रकार श्रम विभाजन सम्भव होता है। जो सदस्य जिस प्रकार का कार्य अधिक कुशलता से कर सकता है उसे वहीं कार्य सौंपा जाता है।

(ii) नागरिकता की प्राथमिक पाठशाला — संयुक्त परिवार में देश के भावी नागरिकों को अच्छी शिक्षा मिल सकती है। यहीं पर बच्चों को मिलकर रहने, एक दूसरे की सहायता करने और पारस्परिक प्रेम की भावना को शिक्षा मिल जाती है।

(iii) आर्थिक सुरक्षा का आश्वासन संयुक्त परिवार में बिना माँ बाप के बालकों, विधवाओं, वृद्धों, अपंगों, बेरोजगारों और सभी प्रकार के अपाहिजों आदि का भरण-पोषण होना है। इस प्रकार प्रत्येक संयुक्त परिवार सामाजिक बीमे का काम करता है।

(iv) सम्पत्ति का विभाजन नहीं — इस प्रणाली में सभी सदस्य एक साथ रहते हैं। अत: भूमि का छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटवारा नहीं होता है।

संयुक्त परिवार के दोष (Demerits of joint Family)- संयुक्त परिवार में अनेक गुणों के साथ उनमें कई दोष भी पाये जाते हैं। संयुक्त परिवार के कुछ प्रमुख दोष को निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है

(i) आर्थिक क्रिया की प्रेरणा को ठेस संयुक्त परिवार में प्रत्येक सदस्य को न्यूनतम जीवन निर्वाह के साधनों की निश्चितता के कारण कुछ विलासी और आलसी व्यक्ति अनुचित लाभ उठाते हैं। जिससे उनमें आत्म निर्भरता और स्वयं कुछ करने की इच्छा समाप्त हो जाती है।

(ii) श्रम विभाजन की गतिशीलता में बाधा — परिवार के मोह के कारण परिवार के सदस्य बाहर नहीं जाना चाहते, चाहे उन्हें बेकार ही क्यों न रहना पड़े। इस प्रकार श्रम विभाजन की गतिशीलता में बाधा पड़ती है।

 (iii) पारिवारिक कलह — संयुक्त परिवार प्रणाली में एकता व सहयोग के साथ साथ कभी विभिन्न सदस्यों में आपसी ईर्ष्या, द्वेष और कलह आदि होने की अधिक आशंका रहती है।

(iv) पंजी संचय में कमी परिवार के सदस्यों को बचत में कोई व्यक्तिगत हित न होने से उनमें अपव्यय को प्रोत्साहन मिलता है जिससे पूँजी के संचय में रुकावट आती है।


8. भारतीय पारिवारिक व्यवस्था में होने वाले आधुनिक परिवर्तनों की चर्चा करें।

उत्तर औद्योगिकीकरण और वैज्ञानिक प्रगति का प्रभाव समाज और परिवार पर भी स्वाभाविक है। फलस्वरूप परिवार के स्वरूप, उसकी संरचना, उसके कार्य आदि में अनेक परिवर्तन हुए हैं।     परिवार में हुए परिवर्तन को निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं—

(i) परिवार के ढांचे में परिवर्तन

(a) परिवार का आकार पहले परिवारों में सदस्यों की संख्या अधिक होती थी, और अधिकांश परिवार संयुक्त परिवार होते थे परन्तु आधुनिक परिवार का आकार पहले से छोटा हो गया है।

(b) स्त्रियों कि स्थिति — आधुनिक परिवार में स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन स्त्री परिवार की दासी नहीं, बल्कि उसे भी समान अधिकार प्राप्त हो रहे हैं। हुआ है। आज

 (c) विवाह का स्वरूप आधुनिक परिवार में विवाह की पद्धति अनिवार्यतः एक विवाही है। बाल विवाह, बहुविवाह आदि प्रथाएँ आधुनिक परिवार में प्राय: नहीं पाई जाती। तलाक की प्रथा भी आज के समाज में न्याय संगत कर दी गई है फलस्वरूप बेमेल विवाह की स्थिति में पति-पत्नी तलाक का शरण भी लेते हैं।

(d) परिवार का स्थायित्व आधुनिक संयुक्त परिवारों की संरचना में परिवर्तन हो रहे हैं। वर्तमान सामाजिक जीवन की गतिशीलता के फलस्वरूप परिवार एक स्थान से दूसरे स्थान में स्थानांतरित होते रहते हैं। अपने जीविकोपार्जन के लिए परिवार के विभिन्न सदस्य विभिन्न पेशों “में लगे रहने के कारण संबद्ध स्थान में रहने को बाध्य होते हैं।

(e) पारस्परिक संबंध — पारिवारिक संबंध में इधर कई परिवर्तन हुए हैं। पहले पति-पत्नी का जैसा संबंध था। उसका लोप होता जा रहा है। पत्नी की नजर में पति, देवतातुल्य था। भले ही वह अत्याचारी या भ्रष्टाचारी क्यों न हो, परन्तु पति की ऐसी निरंकुशता का ह्रास हो रहा है। आज पति-पत्नी का संबंध पारस्परिक सहयोग पर अधिक आधारित है।

(ii) परिवार के कार्यों में परिवर्तन परम्परागत परिवार और आधुनिक परिवारों के कार्यों में दिनोदिन परिवर्तन होते जा रहे हैं।

परिवार के कार्यों में परिवर्तन का आर्थिक कारण भी हैं। भोजन के लिए होटल, कपड़ा सीने के लिए दर्जी घर, धुलाई के लिए लौंड़ी, बच्चों के पालन पोषण के लिए नर्सरी आदि संस्थाएँ विकसित हो गई हैं। फलस्वरूप परिवार के सभी मूलभूत कार्य आज बाहरी संगठन भी करने लगे हैं। इससे परिवार के परंपरागत आर्थिक कार्यों में स्पष्ट परिवर्तन हुए हैं।

परिवार के कार्यों में परिवर्तन का राजनीतिक कारण भी है। आज राज्य के संगठनों और इसके विकसित स्वरूप के फलस्वरूप परिवार के कार्यों में बहुत परिवर्तन हुआ है। राज्य के द्वारा आवास की व्यवस्था से लेकर बच्चों के लालन पालन, उनकी शिक्षा की व्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा आदि कार्य आज संपन्न होने लगे हैं। यही कारण है कि परिवार का आज वह महत्त्व नहीं रहा जो परंपरागत परिवार का था।


9. संयुक्त परिवार और एकाकी परिवार में क्या अन्तर है?

उत्तर ⇒  एकाकी परिवार एवं संयुक्त परिवार के बीच पाये जाने वाले अन्तर को निम्नलिखित रूप में देखा जा सकता है..

(i) सदस्यता का अन्तर — संयुक्त परिवार में कई पीढ़ियों के सदस्य एक साथ रहते हैं। जबकि एकाकी परिवार में केवल पति-पत्नी और उनके बच्चे रहते हैं।

(ii) आकार का अन्तर — संयुक्त परिवार का आकार बड़ा होता है और एकाकी परिवार का आकार अपेक्षाकृत छोटा होता है।

(iii) शासक का अन्तर संयुक्त परिवार में परिवार का वयोवृद्ध व्यक्ति मुखिया होता है किन्तु एकाकी परिवार में पिता परिवार का शासक होता है।

(iv) प्रकृति में अन्तर —  संयुक्त परिवार के संबंधों में जटिलता पाई जाती है जबकि एकाकी परिवार के संबंधों में सरलता पाई जाती है।

(v) वातावरण का अन्तर संयुक्त परिवार में कलहपूर्ण वातावरण पाया जाता है जबकि एकाकी परिवार में सदस्य संख्या कम होती है जिसके फलस्वरूप यहाँ शान्ति का वातावरण पाया जाता है।

(vi) आदर्शों में अन्तर — संयुक्त परिवार में बाल विवाह, सन्तान उत्पादन पर अधिक बल दिया जाता है, किन्तु एकाकी परिवार में युवा-विवाह एवं परिवार नियोजन आदि को प्रोत्साहन दिया जाता है।

(vii) मितव्ययिता का अन्तर — संयुक्त परिवार में सभी सदस्य एक साथ मिलकर किसी कार्य को करते हैं जिससे धन एवं श्रम दोनों की बचत होती है जबकि एकाकी परिवार में इस बात का अभाव पाया जाता है।

(vill) भावना का अन्तर— संयुक्त परिवार में ‘हम की भावना पाई जाती है, परन्तु एकाकी परिवार में इस भावना का पूर्ण अभाव होता है।

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10. भारतीय संयुक्त परिवार व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं की चर्चा करें। 

उत्तर ⇒  भारतीय संयुक्त परिवार की विशेषता –

(i) बड़ा आकार — संयुक्त परिवार में एक से अधिक पीढ़ी के लोग एक साथ रहते हैं।

(ii) सामान्य निवास – संयुक्त परिवार में सभी सदस्य एक निवास स्थान में रहते हैं।

(iii) सामान्य रसोई — इसके अंतर्गत परिवार के सभी सदस्य एक ही रसोई में बना भोजन करते हैं। भाजन बनाने में परिवार की सभी स्त्रियाँ सहयोग करती हैं, जबकि रसोई का संचालन परिवार की मुखिया की पत्नी या सबसे बुर्जुग महिला द्वारा किया जाता है।

(iv) संयुक्त संपत्ति— कानूनी और सामाजिक तौर पर एक संयुक्त परिवार के सदस्यों के बीच संपत्ति का कोई बँटवारा नहीं होता। सदस्यों द्वारा अर्जित संपत्ति को एक समान कोष में परिवार के मुखिया के देख रेख में रखा जाता है। मुखिया के द्वारा ही परिवार के सभी सदस्यों की आवश्यकताओं को पूरा किया जाता है।

(v) कर्ता की प्रधानता — यह परिवार के आय की व्यवस्था करता है। सदस्यों को काम सौंपना तथा रीति-रिवाजों के अनुसार सदस्यों के व्यवहार पर नियंत्रण लगाता है।

(vi) अधिक स्थायित्व — यह अधिक स्थायित्व होता है, सदस्यों में ‘हम की भावना’ पायी जाती है।

(vii) परंपराओं की प्रधानता होती है।


11. नातेदारी की पाँच रीतियों का विश्लेषण करें।

उत्तर प्रत्येक समाज में नातेदारी व्यवहार प्रतिमानों को नियंत्रित व निर्देशित करने के लिए कुछ विशेष नियम या रीतियाँ होती हैं, जिन्हें हम नातेदारी व्यवहार या रीतियाँ (Kinship Usages) कहते हैं। इन रीतियों के द्वारा व्यक्ति को यह समझाया जाता है कि वह किसके साथ घनिष्ठतापूर्ण व्यवहार करे और किससे दूरी बनाये रखें।

(i) परिहार (Avoidance) — नातेदारी व्यवस्था में परिहार नियमों का विशेष महत्त्व है। परिहार संबंधों के अंतर्गत नातेदारी में दो परस्पर संबंधी आमने-सामने की स्थिति में प्रत्यक्ष रूप से व्यवहार करने से बचते हैं। उदाहरण के लिए श्वसुर और पुत्र-वधू तथा सास और दामाद के बीच परिहार संबंधों का प्रचलन अधिकांश समाजों में पाया जाता है। नातेदारी की इस रीति में संभवतः यह प्रयास किया जाता है कि श्वसुर पुत्रवधू और दामाद- सास आमने सामने अर्थात् प्रत्यक्ष सामने होने की स्थिति में परस्पर वार्तालाप या वाद-विवाद न करें।

 (ii) परिहास, संबंध (Joking Relation) — नातेदारी व्यवस्था में परिहास संबंध’ परिहास संबंधों के विपरीत प्रकृति के होते हैं। सामान्यतः परिहास संबंधों का प्रचलन विशेष रूप से विवाह संबंधियों से होता है। परिहास संबंधों में हँसी-मजाक, छेड़छाड़, अश्लील व भद्दे कथन यहाँ तक कि कुछ सीमा तक यौन-नैतिकता के नियमों में भी शिथिलता पायी जाती है।

(III) माध्यमिक संबोधन (Teknonymy)– माध्यमिक संबोधन व्यवहार का वह तरीका है जिसमें किसी संबंधी के संबोधन हेतु किसी अन्य व्यक्ति को माध्यम बनाया जाता है। इस प्रकार के संबंधों का प्रचलन प्राय: उन समाजों में पाया जाता है, जहाँ संबंधी का नाम लेना वर्जित होता है। उदाहरण के लिए, हमारे समाज में अधिकांश पत्नियाँ अपने पति का संबोधन बच्चे के माध्यम से करती हैं।

(iv) मातुलेय (Ayunculate)- नातेदारी व्यवस्था में मातुलेय संबंधों का प्रचलन मातृसत्तात्मक परिवारों में पाया जाता है। इस प्रकार के संबंधों में सभी पुरुष नातेदारों में ‘मामा’ सर्वोपरि होता है। यही कारण है कि मातृसत्तात्मक समाजों में बच्चे अपने पिता के बजाय मामा को अधिक सम्मान है और महत्त्व प्रदान करते हैं।

(v) पितृश्वश्रेय (Amitate) – ऐसे समाजों में नातेदारी व्यवस्था के अन्तर्गत पिता की बहन (बुआ) अर्थात् ‘पितृश्वसा’ का अधिक महत्त्व होता है।


12. नातेंदारी के श्रेणियाँ की व्याख्या करें । (Explain the categories of kinship.)

उत्तर ⇒  विवाह या रक्त संबंधों के आधार पर जुड़े हुए व्यक्ति नातेदारी व्यवस्था का निर्माण करते हैं। इसका तात्पर्य है कि नातेदारी रक्त और विवाह से संबंधित व्यक्तियों के बीच सामाजिक संबंधों और विभिन्न प्रकार के सम्बोधनों की वह व्यवस्था है जो इन संबंधियों से जुड़े हुए व्यक्तियों को उनके सामाजिक अधिकारों और कर्तव्यों का बोध कराती है।

   नातेदारी की प्रकार (Categories of kinship) — नातेदारी व्यवस्था विभिन्न व्यक्तियों को सामाजिक निकटता के आधार पर अनेक श्रेणियों में विभाजित करती है। विभिन्न नातेदारों से निकटता और दूरी को स्पष्ट करने के लिए जो श्रेणियाँ बनती हैं उन्हें तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है।

(i) प्राथमिक नातेदार जिन व्यक्तियों के बीच रक्त या विवाह का प्रत्यक्ष संबंध होता है उन्हें एक दूसरे का प्राथमिक नातेदार कहा जाता है, जैसे पिता-पुत्र, पिता-पुत्री, माता-पुत्र, माता-पुत्री, भाई-भाई, भाई-बहन, बहन-बहन तथा पति-पत्नी को हम एक दूसरे का प्राथमिक नातेदार कहते हैं। यह सभी एक दूसरे के प्राथमिक नातेदार इस कारण है कि इनके संबंधों के बीच दूसरा कोई नहीं आता।

(ii) द्वितीयक नातेदार जो व्यक्ति हमारे प्राथमिक नातेदार के प्राथमिक संबंधी होते हैं. वे हमारे द्वितीयक नातेदार हो जाते हैं, जैसे पिता से जन्म मिलने के कारण पिता हमारे प्राथमिक नातेदार हैं जबकि पिता के भाई हमारे द्वितीयक नातेदार होंगे क्योंकि हमारे पिता के वह प्राथमिक नातेदार हैं। इसी प्रकार माता से जन्म मिलने के कारण वह हमारी प्राथमिक नातेदार हैं, लेकिन माता का हमारे नाना या मामा से प्राथमिक संबंध होने के कारण, वे हमारे द्वितीयक नातेदार हो जायेंगे ।

 (iii) तृतीयक नातेदार — हमारे द्वितीयक नातेदारों के प्राथमिक संबंधियों को हम अपना तृतीयक नातेदार कहते हैं। जैसे अपने पिता और माता की सगी बहिनें हमारी द्वितीयक नातेदार होंगी जबकि उनके सभी बच्चों से हमारे संबंध तृतीयक नातेदारी के अंतर्गत आयेंगे। इस प्रकार सभी फुफेरे, मौसेरे तथा ममेरे भाई-बहन एक दूसरे के तृतीयक नातेदार होते हैं।

इसी प्रकार नातेदारी की श्रेणियों को आगे की ओर बढ़ाया जा सकता है। इससे एक विशेष व्यक्ति के प्रति अधिकारों एवं कर्तव्यों का निर्धारण होता है।

Class 12th Sociology Long Question Answer 2024


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