Class 10th History Subjective Question In Hindi | BSEB 10th समाजवाद एवं साम्यवाद Subjective

Class 10th History Subjective Question :-  दोस्तों यदि आप 10th Social Science Subjective Bihar Board की तैयारी कर रहे हैं तो यहां पर आपको 10th History ( समाजवाद एवं साम्यवाद ) Subjective Question दिया गया है जो आपके Class 10th Ka Social Science Ka Subjective Question के लिए काफी महत्वपूर्ण है | BSEB 10th & 12th App


1. अक्टूबर क्रांति क्या है?

उत्तर   7 नवंबर 1917 ईस्वी में वोलशेविकों ने पेट्रोग्राड के रेलवे स्टेशन, बैंक ,डाकघर ,टेलीफोन केंद्र ,कचहरी तथा अन्य सरकारी भवनों पर अधिकार कर लिया। करेंसी भाग गया और शासन की बागडोर बोल्शेविको के हाथ में आ गई जिसका अध्यक्ष लेनिन को बनाया गया। इस क्रांति को बोल्शेविक क्रांति या नवंबर की क्रांति कहते हैं। इसे अक्टूबर की क्रांति भी कहा जाता है , क्योंकि पुराने कैलेंडर के अनुसार ही रहे 25 अक्टूबर , 1917 ईस्वी की घटना थी।


2. पूंजीवाद क्या है?

उत्तर  पूंजीवादी ऐसी राजनीतिक आर्थिक व्यवस्था है जिसमें निजी संपत्ति तथा निजी लाभ की अवधारणा को मान्यता दी जाती है। यह सार्वजनिक क्षेत्र में विस्तार एवं आर्थिक गतिविधियों में सरकारी हस्तक्षेप का विरोध करती है।

Class 10th History Subjective Question In Hindi


3. रूसी क्रांति के किंही दो कारणों का वर्णन करें।

उत्तर  रूसी क्रांति के निम्न दो कारण हैं-

मजदूरों की दयनीय स्थिति: रूस में मजदूरों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उन्हें अधिक काम करना पड़ता था परंतु उनकी मजदूरी काफी कम थी। उनके साथ दुर्व्यवहार तथा अधिकतम शोषण किया जाता था, मजदूरों को कोई राजनीतिक अधिकार नहीं थे। अपनी मांगों के समर्थन में वे हड़ताल भी नहीं कर सकते थे और न‘ मजदूर संघ’ बना सकते थे। मार्क्स ने मजदूरों की स्थिति का चित्रण करते हुए लिखा है कि ” मजदूरों के पास अपनी बेटियों को खोने के अलावा और कुछ भी नहीं है।”यह मजदूर पूंजीवादी व्यवस्था एवं चार साहिब की निरंकुशता को समाप्त कर ‘ सर्वहारा वर्ग ’ का शासन स्थापित करना चाहते थे।

औद्योगिकीकरण की समस्या: रूस में एलेग्जेंडर-।।। के समय में औद्योगिकीकरण की गति में तीव्रता आई,लेकिन रूसी औद्योगिकीकरण पश्चिमी पूंजीवादी औद्योगिकीकरण से भीन्न था।यहां कुछ ही क्षेत्रों में महत्वपूर्ण उद्योगों के विकास के लिए विदेशी पूंजी पर निर्भरता बढ़ती गई। विदेशी पूंजीपति आर्थिक शोषण को बढ़ावा दे रहे थे इसके कारण लोगों में असंतोष व्याप्त था।


4. सर्वहारा वर्ग किसे कहते हैं?

उत्तर  समाज का वह वर्ग जिसमें गरीब किसान, कृषक मजदूर, सामान्य मजदूर, श्रमिक एवं आम गरीब लोग शामिल हो, उसे सर्वहारा वर्ग कहते हैं।


5. रूसी करण की नीति क्रांति हेतु कहां तक उत्तरदाई थी?

उत्तर  रूसी करण की नीति:रूस की प्रजा विभिन्न जातियों के सम्मिश्रण से बनी थी। वहां कई धर्म प्रचलित थे। कई भाषाएं थी। रूस में स्लाव, फीन, पोल, जर्मन, यहूदी आदि अन्य जातियों के लोग थे परंतु इनमें सलाव जाति के लोग प्रमुख थे। इन अल्पसंख्यक जातियों के विरुद्ध जार निकोलस द्वितीय के समय रूसी करण की नीति अपनाई गई और ‘ एक जार एक धर्म ’ का नारा अपनाया गया। गैर रूसी जनता का दमन किया गया, इनकी भाषाओं पर प्रतिबंध लगाए गए, इनकी संपत्ति छीन ली गई। 1863 ईस्वी में इस नीति के विरुद्ध पोलो ने विद्रोह किया तो उनका निर्दयतापूर्वक दमन किया गया। इस कारण गैर रूसी जनता में असंतोष फैला और वह जारसाही के विरुद्ध हो गई।


6. साम्यवाद एक नई आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था थी ; कैसे ?

उत्तर मजदूरों को पूंजीपतियों के शोषण से मुक्त कराना, उत्पादन एवं वितरण में समानता स्थापित करना, मजदूरों को विशेष सुविधाएं, जैसे-कार्य के घंटे, वेतन,मजदूरों को संघ बनाने की सुविधाएं तथा मजदूरों की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति कराना। सामाजिक व्यवस्था में वर्ग संघर्ष को समाप्त कर वर्गहीन समाज की स्थापना करना।


7. यूरोपियन समाजवादियों के विचारों का वर्णन करें।

उत्तर  ऐतिहासिक दृष्टि से आधुनिक समाजवाद का विभाजन दो चरणों में किया जाता है-मार्क्स से पूर्व एवं मार्क्स के पश्चात। मार्क्सवादी विचारकों ने इन्हें क्रमशः यूरोपियन समाजवाद तथा वैज्ञानिक समाजवाद का नाम दिया।
यूरोपियन चिंतक आरंभिक चिंतक थे जिन्होंने पूंजी और श्रम के बीच संबंधों की समस्या का निराकरण करने का प्रयास किया। इनकी दृष्टि आदर्शवादी थी यह प्रबुद्ध चिंतकों की तरह मानव की मूलभूत अच्छाई एवं जगत की पूर्णता में विश्वास किया करते थे। इन्होंने वर्ग संघर्ष के बदले वर्ग समन्वय पर बल दिया।


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8. साम्राज्यवाद की क्या विशेषताएं थी?

उत्तर  समानता का अर्थ है- आर्थिक और राजनीतिक समानता। इसमें अवसरों की समानता , योग्यता के अनुसार कार्य करने का अधिकार,समान कार्य के लिए समान वेतन तथा जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति उपलब्ध करने की भावना निहित है। उसका अंतिम लक्ष्य वर्ग संघर्ष का अंत कर वर्गहीन समाज की स्थापना करना है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उत्पादन एवं वितरण के साधनों पर राष्ट्र के अधिकार को उचित ठहराया गया है।
समाजवाद के तीन मुख्य सिद्धांत हैं जिन पर सभी समाजवादी सहमत हैं-
प्रथम- समाजवाद निजी पूंजीवादी की आलोचना करता है।
द्वितीय- समाजवाद श्रमिक वर्ग और मजदूरों की आवाज है। एक तरफ यह व्यवसायिक वर्ग का पक्ष लेता है तो दूसरी तरफ पूंजीपतियों या मिल मालिकों के शोषण मूलक चरित्रों का विरोध करता है।
तृतीय- समाजवाद धन के वितरण के संबंध में न्याय चाहता है-अर्थात उत्पादन के सभी साधनों पर समस्त जाति या समाज का स्वामित्व मान लिया जाए।


9. “ रूस की क्रांति ने पूरे विश्व को प्रभावित किया। ” किन्ही दो उदाहरणों के द्वारा स्पष्ट करें।

उत्तर  1917 की रूसी क्रांति के प्रभाव काफी व्यापक और दूरगामी थे। इसका प्रभाव न केवल roushan बल्कि विश्व के अन्य देशों पर भी पड़ा जो निम्नलिखित थे –

(1) रूसी क्रांति के बाद विश्व विचारधारा के स्तर पर दो खेमों में बट गया-साम्यवादी एवं पूंजीवादी विश्व। धर्म सुधार आंदोलन के पश्चात और साम्यवादी क्रांति के पहले यूरोप में वैचारिक स्तर पर इस तरह का विभाजन नहीं देखा गया था।

(2)रूसी क्रांति की सफलता ने एशिया और अफ्रीका में उपनिवेश मुक्ति को प्रोत्साहन दिया एवं इन देशों में होने वाले राष्ट्रीय आंदोलन को अपना वैचारिक समर्थन प्रदान किया।


10. खूनी रविवार क्या है?

उत्तर  1905 ईसवी के रूस- जापान युद्ध में रूस एशिया के एक छोटे से देश जापान से पराजित हो गया। पराजय के अपमान के कारण जनता ने क्रांति कर दी। 9 जनवरी, 1905 इसवी लोगों का समूह प्रदर्शन करते हुए सेंट पिट्सबर्ग स्थित महल की ओर जा रहा था। जार की सेना ने इन निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसाई जिसमें हजारों लोग मारे गए। यह घटना रविवार के दिन हुई, अतः इसे खूनी रविवार के नाम से जाना जाता है।


11. क्रांति से पूर्व रूसी किसानों की स्थिति कैसी थी?

उत्तर   क्रांति से पूर्व रूसी कृषकों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। वे अपने छोटे-छोटे खेतों में पुराने ढंग से खेती करते थे। उनके पास पूंजी का अभाव था और करों के बोझ से वे दवे हुए थे। समस्त कृषक जनसंख्या का एक तिहाई भाग भूमिहीन था जिनकी स्थिति दासो जैसी थी।


12. प्रथम विश्व युद्ध में रूस की पराजय ने क्रांति हेतु मार्ग प्रशस्त किया; कैसे?

उत्तर  प्रथम विश्वयुद्ध 1914 से 1918 तक चला। रूस इस युद्ध में मित्र राष्ट्रों की ओर से लड़ रहा था। युद्ध में शामिल होने का एकमात्र उद्देश्य था कि रूसी जनता आंतरिक असंतोष को भूलकर बाहरी मामलों में उलझी रहे। परंतु, युद्ध में रूसी सेना चारों तरफ हारी थी। सेनाओं के पास ना अच्छे हथियार थे और ना ही पर्याप्त भोजन की सुविधा थी। युद्ध के मध्य में जार ने सेना का कमान अपने हाथों में ले लिया, फलस्वरूप दरबार खाली हो गया। जार की अनुपस्थिति में जरीना और उसका तथाकथित गुरु रासपुटीन (पादरी) जैसा निकृष्टतमव्यक्ति को षड्यंत्र करने का मौका मिल गया जिसके कारण राजतंत्र की प्रतिष्ठा धूमिल हुई।

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13. नई आर्थिक नीति मार्क्सवादी सिद्धांतों के साथ समझौता था। कैसे?

उत्तर  मार्च, 1921 ईस्वी में लेनिन ने नई आर्थिक नीति का प्रतिपादन किया जिसमें साम्यवादी विचारधारा के साथ ही साथ पूंजीवादी विचारधारा को स्वीकार किया गया। जैसे-

(1) कृषको से अतिरिक्त उपज की अनिवार्य वसूली बंद कर दी गई एवं किसानों को अतिरिक्त उत्पादन को बाजार में बेचने की अनुमति प्रदान की गई।
(2) 1924 ईस्वी में सरकार ने अनाज के स्थान पर रूबल (सोवियत संघ की मुद्रा) में कर लेना प्रारंभ किया।
(3) सेवियर संग में छोटे उद्योगों का विराष्ट्रीयकरण किया गया।1922 इसी में 4 हजार छोटे उद्योगों को लाइसेंस जारी किया गया।
(4) श्रमिकों को कुछ नगद मुद्रा प्रदान किया जाने लगा।


14. समाजवाद क्या है?

उत्तर  उत्पादन,वितरण एवं लाभ पर राष्ट्र तथा समाज का नियंत्रण और आर्थिक एवं सामाजिक समानता की स्थापना।


15. समाजवाद शब्द का सर्वप्रथम उपयोग कहां और कब हुआ था?

उत्तर समाजवाद शब्द सर्वप्रथम 1832 में ‘ ले ग्लोब ’ नामक एक फ्रांसीसी पत्रिका में छपा।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1. लेनिन के जीवन एवं उपलब्धियों पर प्रकाश डालें।

उत्तर  रूस में बोल्शेविक क्रांति का प्रणेता लेनिन था। उसका जन्म 10 अप्रैल 1870 को वोल्गा नदी के किनारे सिमब्रस्क नामक गांव में हुआ था। वह जारशाही का विरोध और मार्क्सवाद का समर्थक था। उसने सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी की सदस्यता ग्रहण की और बोल्शेविक दल का नेता बन गया। 1905 की रूसी क्रांति में उस ने भाग लिया था। मार्च 1917 में स्विट्जरलैंड से रूस वापस आकर उसने बोल्शेविक दल का नेतृत्व ग्रहण किया। अप्रैल थीसिस मैं उसने बोलशेविक दल के उद्देश्य और कार्यक्रम स्पष्ट किए।
लेनिन ने करेंस्की की सत्ता समाप्त कर बोल्शेविक ओ की सरकार स्थापित की। इस प्रकार, रूस में सर्वहारा वर्ग की सरकार बनी। सत्ता की बागडोर संभालने के बाद लेनिन ने रूस के नव निर्माण का कार्य आरंभ किया। 1924 में उसकी मृत्यु हो गई।


2. रूसी क्रांति के कारणों की विवेचना करें।

उत्तर  (1) जार की निरंकुशता एवं अयोग्य शासन : जार निकोलस द्वितीय कठोर एवं दमनात्मक नीति का संरक्षक था। वह राजा के देवी अधिकारों में विश्वास रखता था। उसे केवल अभिजात्य वर्ग और उच्च पदाधिकारियों का ही समर्थन प्राप्त था। इसकी पत्नी भी घोर प्रतिक्रियावादी औरत थी। उस समय रासपुतिन की इच्छा ही कानून थी। वह नियुक्तियों, पदोन्नतिओं तथा शासन के अन्य कार्यों में हस्तक्षेप करता था। अतः गलत सलाहकार के कारण जार की स्वेच्छाचारीता बढ़ती गई और जनता की स्थिति दयनीय होती चली गई।

(2) कृषकों की दयनीय स्थिति : यद्यपि 1861 में कृषि दासत्व को समाप्त कर दिया गया था, परंतु किसानों की स्थिति में विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। रूस की कुल जनसंख्या का एक तिहाई भाग भूमिहीन था जिन्हें जमींदारों की भूमि पर काम करना पड़ता था। इन कृषको को कई तरह के करों का भुगतान करना पड़ता था। इनके पास पूंजी का अभाव था। ऐसी परिस्थिति में किसानों के पास क्रांति ही अंतिम विकल्प थी।

(3) मजदूरों की दयनीय स्थिति : रूस के मजदूरों का काम एवं मजदूरी के आधार पर अधिकतम शोषण किया जाता था। मजदूरों को कोई राजनीतिक अधिकार नहीं थे। यह अपनी मांगों के समर्थन में हड़ताल नहीं कर सकते थे और न ही ‘मजदूर संघ’ बना सकते थे। रूसी मजदूर पूंजीवादी व्यवस्था तथा जारशाही ही की निरंकुशता को समाप्त कर सर्वहारा वर्ग का शासन स्थापित करना चाहते थे।

(4) औद्योगिकीकरण की समस्या : रूस में राष्ट्रीय पूंजी का अभाव था अतः उद्योगों के विकास के लिए विदेशी पूंजी पर निर्भरता बढ़ गई। विदेशी पूंजीपति आर्थिक शोषण को बढ़ावा दे रहे थे। इस कारण लोगों में असंतोष व्याप्त था।

(5) रूसी करण की नीति : रूस में कई जातियां, कई धर्म तथा कई भाषाएं प्रचलित थे। यहां स्लाव जाति सबसे महत्वपूर्ण थी। जार निकोलस द्वितीय ने रूसी करण के लिए “ एक जार एक धर्म ” का नारा दिया तथा गैर रूसी जनता का दमन किया। जार की इस नीति के खिलाफ गैर रूसी जनता में असंतोष फैला और वे जारसाही के विरुद्ध हो गए।

(6) जापान से पराजय तथा 1905 की क्रांति: 1905 के रूस जापान युद्ध में रूस की पराजय एशिया के एक छोटे देश से हो गई। इस पराजय के कारण रूस में 1905 में क्रांति हो गई। इस क्रांति ने अंततः 1917 में बोल्शेविक क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया।

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3. रूसी क्रांति के प्रभाव की विवेचना करें। अथवा, रूसी क्रांति का विश्व पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर  रूसी क्रांति का प्रभाव- रूसी क्रांति के प्रभाव को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(क) सोवियत संघ,   ( ख) विश्व।

(क) सोवियत संघ पर अक्टूबर क्रांति के निम्न प्रभाव पड़े-

(1) स्वेच्छाचारी शासन का अंत- जार शाही एवं कुलीनों के स्वेच्छाचारी शासन का अंत कर दिया गया। तत्पश्चात एक नवीन संविधान का निर्माण किया गया। जिसके अनुसार वहां जनता के शासन की स्थापना हुई।

(2) सर्वहारा वर्ग का शासन- नए संविधान द्वारा मजदूरों को वोट देने का अधिकार मिला। देश की संपूर्ण संपत्ति राष्ट्रीय संपत्ति घोषित की गई। उत्पादन के साधनों पर मजदूरों का नियंत्रण हो गया। उत्पादन व्यवस्था में निजी मुनाफे की भावना को निकाल दिया गया।

(3) साम्यवादी शासन की स्थापना- अक्टूबर क्रांति द्वारा सोवियत संघ में साम्यवादी शासन की स्थापना हुई।

(4) नवीन सामाजिक आर्थिक व्यवस्था का विकास – सोवियत संघ में समाज में व्याप्त गोरा समानताएं समाप्त हो गई । समाज वर्ग विहीन हो गया। अब समाज में एक ही वर्ग रहा और वह था-साम्यवादी नागरिक। काम के अधिकार को संवैधानिक अधिकार बना दिया गया। प्रत्येक व्यक्ति को काम देना समाज एवं राज्य का कर्तव्य समझा गया।

(5) गैर रूसी राष्ट्रों का विलय – जिन गैर रूसी राष्ट्रों पर जारशाही ने सत्ता स्थापित की थी वे सभी क्रांति के बाद राज्यों के रूप में सोवियत संघ के अंग बन गए।

(6) सभी जातियों को समानता का अधिकार- सोवियत संघ में सम्मिलित सभी जातियां की समानता को संविधान में कानूनी रूप दिया गया। उनकी भाषा तथा संस्कृति का भी विकास हुआ।

(ख) रूसी क्रांति का विश्व पर प्रभाव पड़ा – अक्टूबर क्रांति के विश्व पर पड़े प्रभाव को सकारात्मक एवं नकारात्मक दो वर्गों में विभाजित किया जाता है।
सकारात्मक प्रभाव-

(1) 1929-30 की विश्वव्यापी मंदी का सफलतापूर्वक सामना एवं द्वितीय विश्वयुद्ध से विश्व शक्ति के रूप में अपने को स्थापित करने से विश्व के अन्य देशों-चीन, वियतनाम, युगोस्लाविया इत्यादि में साम्यवाद का प्रसार हुआ।

(2) राज्य नियोजित अर्थव्यवस्था, पंचवर्षीय योजना का विकास हुआ।

(3)सोवियत संघ में किसानों एवं मजदूरों की सरकार स्थापित होने से संपूर्ण विश्व में किसान एवं मजदूरों की महत्वपूर्ण वृद्धि हुई।
नकारात्मक प्रभाव-

(4)सोवियत संघ एवं विश्व के कई देशों में साम्यवादी शासन स्थापित होने पर पूंजीवादी देशों (अमेरिका एवं पश्चिमी यूरोप के देश) का तीव्र विरोध हुआ। परिणाम स्वरूप संपूर्ण विश्व पर 1990 तक (सोवियत संघ के विघटन तक) शीत युद्ध की काली छाया छाई रहे।

(5)संपूर्ण विश्व में पूंजीपतियों एवं मजदूरों के मध्य संघर्ष कटु होने लगा।


4.कार्ल मार्क्स की जीवनी एवं सिद्धांतों का वर्णन करें।

उत्तर   मार्च का जन्म 5 मई, 1818 ईस्वी को जर्मनी में राइन प्रांत के ट्रियर नगर में यहूदी परिवार में हुआ था। इनके पिता हेनरी मार्क्स एक प्रसिद्ध वकील थे। मार्क्स बोन विधि विश्वविद्यालय में विधिक शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात 1936 में बर्लिन विधि विश्वविद्यालय चले आए। 1843 में अपने बचपन की मित्र जेनी से विवाह किया। मार्क्स हींग एल के विचारों से प्रभावित थे। मार्क्स ने राजनीतिक एवं सामाजिक इतिहास पर मांटेस्कयू तथा रूसो के विचारों का गहन अध्ययन किया। 1844 ईसवी में मार्क्स की मुलाकात फ्रेडरिक एंगेल्स से पेरिस में हुई। मां अपने अपने मित्र फ्रेडरिक एंजेल के साथ मिलकर 1848 इसवी में ( कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो ) ‘साम्यवादी घोषणा पत्र’ प्रकाशित किया जिसे आधुनिक समाजवाद कहा जाता है। इस घोषणापत्र में मार्क्स ने अपने आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विचारों को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया। 1867 में मार्क्स एवं एंजेल्स ने ‘ दास कैपिटल ’ की रचना की जिसे समाजवादियों की बाइबिल कहा जाता है। यही दो पुस्तकें मार्क्सवादी दर्शन के मूलभूत सिद्धांतों को प्रस्तुत करती है जिसे 20वीं शताब्दी में साम्यवाद कहा गया है।

मार्क्स के सिद्धांत-

(1) द्वंदात्मक भौतिकवाद का सिद्धांत
(2) वर्ग संघर्ष का सिद्धांत
(3) इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या (इतिहास के आर्थिक व्याख्या)
(4) मूल्य एवं अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत
(5) वर्ग विहीन समाज की स्थापना की।

ऐतिहासिक भौतिकवाद-

मार्क्स के द्वारा इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या प्रस्तुत की गई। मां ने इतिहास के प्रत्येक घटना एवं परिवर्तन का मूल आर्थिक शक्तियां है। उत्पादन प्रणाली के प्रत्येक परिवर्तन के साथ सामाजिक संगठन में भी परिवर्तन हुआ। इतिहास में पांच चरण, अब तक दृष्टिगोचर हैं और छठा चरण आने वाला है।

इस प्रकार कार्ल मार्क्स निम्नलिखित इतिहासिक चरण बताते हैं-

(1) आदिम साम्यवादी युग (age of primitive communism)
(2) दाता का युग(slave age)
(3) सामंती युग(feudal age)
(4) पूंजीवादी युग(capitalist age)
(5) समाजवादी युग(socialist age)
(6) साम्यवादी युग(communist age)

मार्क्स के विचार में ऐतिहासिक प्रक्रिया में प्राचीन समाज का आधार दास्तां, सामंतवादी समाज का आधार भूमि तथा मध्यवर्गीय समाज का आधार नगद पुंजी है। यही मार्क्स की इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या है।
वर्ग हीन समाज की स्थापना- मार्क्स का मानना था कि पूंजीपति वर्ग तथा सर्वहारा वर्ग के बीच जो संघर्ष है उसमें निश्चित रूप से सर्वहारा वर्ग की विजय होगी और एक वह वहीं समाज की स्थापना होगी। मार्क्सवाद का आदर्श एक वर्ग हीन समाज की स्थापना करना है जिसमें व्यक्ति के हित और समाज के हित में कोई अंतर नहीं होता।


5. नई आर्थिक नीति क्या है?

उत्तर   मार्च 1921 ईस्वी में साम्यवादी दल के दसवें अधिवेशन में ‘नई आर्थिक नीति ’ की घोषणा लेनिन की थी। इस नीति के द्वारा लर्निंग साम्यवादी सिद्धांत के साथ ही साथ पूंजीवादी विचारधारा को भी स्वीकार किया। इस नीति का उद्देश्य श्रमिक वर्ग और कृषकों के आर्थिक सहयोग को सुदृढ़ बनाना,नगरों और गांव के समस्त श्रमजीवी वर्ग को देश की अर्थव्यवस्था का विकास करने के लिए प्रोत्साहित करना तथा अर्थव्यवस्था के प्रमुख सूत्रों को शासन के अधिकार में रखते हुए,आंशिक रूप से पूंजीवादी व्यवस्था को कार्य करने की अनुमति देना था।
नई आर्थिक नीति के निम्नलिखित लाभ हुए-
(1) कृषि का पुनरुद्धार-कृषकों से अतिरिक्त उपज की अनिवार्य वसूली बंद कर दी गई एवं किसानों को अतिरिक्त उत्पादन को बाजार में बेचने की अनुमति प्रदान की गई।

(2) उद्योग- युद्ध सामग्री और उत्पादन के स्तर को ऊंचा करने के लिए आवश्यक था कि औद्योगिकरण तेजी से किया जाए । स्टालिन ने रूस को मशीन आयात करने वाले देश से मशीन निर्माण करने वाले देश बना दिया था।

(3) मुद्रा सुधार एवं व्यवस्था- गृह युद्ध के कारण देश के कारण देश में मुद्रा का पूरी तरह अवमूल्यन हो चुका था। अतः 1922 में शासकीय बैंक को जब चवोनेट्स (10 स्वर्ण रूबल के बराबर) बैंक नोट जारी करने के लिए प्राधिकृत किया गया। 1924 में मुद्रा सुधार करके रूबल की विनिमय दर स्थिर बना दी गई।

(4) छोटे उद्योग- सोवियत संघ में जहां बड़े उद्योगों पर पूर्ण सरकारी नियंत्रण था, वही कुछ छोटे उद्योगों का वीराष्ट्रीयकरण किया गया। 1922 ईस्वी में 4000 छोटे उद्योगों को लाइसेंस जारी किया गया।

(5) श्रम और मजदूर संघ की नीति- जबरदस्ती शर्म करवाने और बराबर वेतन ना देने की नीति समाप्त हो गई।श्रमिकों को कुछ नगर मुद्रा भी दिया जाने लगा। कुल मिलाकर नई आर्थिक नीति ने प्रथम महायुद्ध की क्रांति के समय तथा गृह युद्ध की अवधि में हुए विनाश से अर्थव्यवस्था को शीघ्र ही सुधारने में बड़ी मदद की।

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