12th Sociology Book Solution in Hindi Bihar Board

12th Sociology Book Solution in Hindi Bihar Board | Bihar Board 12th Sociology Question 2024

Class 12th Sociology

12th Sociology Book Solution in Hindi Bihar Board :- यदि आप लोग Sociology Class 12 Question and Answer in Hindi की तैयारी कर रहे हैं तो यहां पर आपको BSEB 12th Sociology Important Question Answer 2024 का महत्वपूर्ण प्रश्न दिया गया है | Bihar Board 12th sociology Question Paper 2024


12th Sociology Book Solution in Hindi Bihar Board

1. स्त्रियों के कल्याण के लिए सरकारी नीति की व्याख्या करें। 

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उत्तर स्त्रियों को पुरुषों के समान सभी अवसर उपलब्ध कराने के लिए तथा स्त्री पुरुष समानता पर बल देने के लिए भारत सरकार ने स्पष्ट नीति अपनाई है। 1976 ई० से पूरे देश में स्त्रियों के लिए एक राष्ट्रीय योजना प्रारंभ की गई है। यह योजना नारी कल्याण तथा विकास की नीतियों व कार्यक्रमों को बनाने के लिए निर्देश देती है। नारियों और बच्चों के लिए चल रहे विकास कार्यक्रमों को पुनर्जीवित रखने के लिए सन् 1985 में बने मानव संसाधन विकास मंत्रालय में महिला और बाल विकास के लिए अलग-अलग विभाग बनाया गया है। सरकारी नीति के अंतर्गत उठाए गए कुछ महत्त्वपूर्ण कदम निम्नलिखित हैं

(i) महिला कर्मचारी के लिए हॉस्टल — निम्न आय वाली कार्यरत महिलाओं के लिए सस्ते एवं सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने के लिए 1972 ई० में एक योजना आरंभ की गई थी। इसके अन्तर्गत देश में बहुत से हॉस्टल का निर्माण हुआ है।

 (ii) पीड़ित महिलाओं के पुनर्वास के लिए प्रशिक्षण केन्द्र — यह योजना 1977 ई० में 18 से 20 वर्ष आयु की अत्यन्त गरीब महिलाओं को बिक्री योग्य वस्तुएँ बनाने का प्रशिक्षण देने के उद्देश्य से प्रारंभ की गई।

(iii) रोजगार तथा आय उत्पन्न करने वाली उत्पादन इकाइयाँ — यह योजना 1982 ई० में नार्वे की अन्तर्राष्ट्रीय विकास संस्था के सहयोग से प्रारंभ की गई। इस कार्यक्रम से गरीब ग्रामीण महिलाओं, अनुसूचित जाति व जनजाति जैसे कमजोर वर्गों की महिलाओं, युद्ध में मारे गए सैनिकों तथा कार्यक्रम क्रियान्वयन में लगे संगठनों के मृत कर्मचारियों की विधवाओं को लाभ मिल रहा है।

 (iv) महिला प्रशिक्षण तथा रोजगार कार्यक्रम में सहायता — यह योजना 1986-87 में महिलाओं के काम करने वाले क्षेत्रों जैसे कृषि, दुग्धउत्पादन, पशुपालन, मछली पालन, खादी व ग्रामोद्योग, हस्तशिल्प तथा रेशा विकास आदि में महिलाओं को रोजगार देने के लिए लागू की गई।

(v) महिलाओं के लिए विकास निगम —1986-87 के दौरान सभी राज्यों में महिलाओं के लिए विकास निगम के गठन के बारे में एक नई योजना बनाई गई है। इस योजना का उद्देश्य महिलाओं को बेहतर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए वित्तीय सहायता देना है।

(vi) महिला शिक्षा सामाजिक आर्थिक गति को तेज करने में लड़कियों एवं महिलाओं की शिक्षा के महत्त्व को स्वीकार करते हुए सरकार ने समय-समय पर इस दिशा में अनेक कदम उठाए हैं।


2. औद्योगिकीकरण का अर्थ स्पष्ट करें। औद्योगिकीकरण से होने वाले सामाजिक परिवर्तनों की विवेचना करें।

उत्तर औद्योगिकीकरण औद्योगिक क्रान्ति का प्रतिफल है। औद्योगिकीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें लघु एवं कुटीर उद्योगों के स्थान बड़े पैमाने के उद्योग के रूप ले लेते हैं। विभिन्न विद्वानों ने औद्योगिकीकरण को अपने-अपने ढंग से परिभाषित किया है कुछ विद्वानों के विचार निम्नलिखित हैं—

औद्योगिकीकरण तथा यांत्रिक परिवर्तन का आपस में बड़ा घनिष्ठ संबंध है। इसके कारण विभिन्न तरह की सामाजिक संस्थाओं का निर्माण हुआ है तथा सामाजिक संबंधों में परिवर्तन आया औद्योगिकीकरण के परिणामस्वरूप छोटे-छोटे कारखानों की जगह बड़े-बड़े कारखाने ले लेते हैं तथा उत्पादन की मात्रा में वृद्धि होती है। दूसरी ओर जब औद्योगिकीकरण तेजी से होता है तो बड़े-बड़े कारखानों की स्थापना होती है। औद्योगिकीकरण से श्रमिकों की क्षमता में भी परिवर्तन आ जाता है। जिस वस्तु के उत्पादन में पहले अनेक व्यक्ति लगते थे उसके उत्पादन में यंत्रीकरण के बाद बहुत कम आदमी लगते हैं। यंत्रीकरण के द्वारा नये सामाजिक संबंधों का भी निर्माण होता है। विभिन्न प्रकार के सामाजिक बदलाव आते हैं। इस सामाजिक परिवर्तनों के कारण लोगों के विचार तथा दृष्टिकोण में भी बदलाव आता है। जीवन प्रणाली भी परिवर्तित हो जाती है। फलतः राजनीतिक व्यवस्था भी बदल जाती है।

औद्योगिकीकरण के कारण सामाजिक गतिशीलता में अपूर्व वृद्धि हुई। लोग अपने व्यवसाय, स्थान एवं विचारों में परिवर्तन करने लगे। रूढ़िवादिता एवं अंधविश्वासों का स्थान तर्क ने ले लिया है। जाति और व्यवसाय का संबंध टूटने लगा। यातायात की सुविधाओं एवं अनेक अन्य कारणों ने लोगों को ग्राम से नगरों की ओर और ग्राम से ग्राम की ओर जाने अर्थात् प्रव्रजन की प्रेरणा दी। इस प्रकार औद्योगिकीकरण एवं नगरीकरण ने सामाजिक आर्थिक गतिशीलता को बढ़ाने में विशेष योग दिया।

12th Sociology Book Solution In Hindi 2024


3. वैश्वीकरण क्या है? भारत पर पड़ने वाले इसके प्रभावों की विवेचना करें।

उत्तर ⇒  वैश्वीकरण एक नयी अवधारणा है। इसके विविध पक्षों का गंभीर विश्लेषण अभी जारी है। अभी तक उसकी सर्वमान्य परिभाषा नहीं बन पायी है। हाल ने लिखा है “नये स्थान और समय में संस्कृतियों और समुदायों के एकीकरण और उसे जोड़ने वाले तथा दुनिया को एक वास्तविकता और अधिकाधिक अन्तसंबंधित बनाने वाले अर्थ में वैश्वीकरण को देखा जा सकता है। “

वैश्वीकरण के प्रभाव :

वैश्वीकरण के निम्नलिखित प्रभाव पड़े हैं—

(i) विश्व अर्थव्यवस्था का एकीकरण — आज विश्व में उदारीकरण, खुली अर्थव्यवस्था एवं मुक्त बाजार प्रणाली लागू है जिसके कारण विश्व अथव्यवस्था का एकीकरण हो रहा है।

(ii) सामान्य मुद्रा — वैश्वीकरण के दौरान मुद्रा का एकीकरण हो रहा है। वर्ष 2001 में यूरोप के सभी देशों की एक सामान्य मुद्रा हो गयी है। इससे संपूर्ण यूरोप के देशों को मुद्रा विनिमय में सहजता हो गयी है।

(iii) विश्व बाजार का एकीकरण — अधिकांश देशों के माल की खपत हेतु अधिकांश देशों में बाजार खुले हैं। इससे व्यापार और वाणिज्य की पर्याप्त संभावनायें उपलब्ध हुई है। लेकिन इसका नकारात्मक प्रभाव भी पड़ा है। बाजार द्वारा लघु तथा कुटीर उद्योग को हाशिये पर किया जा रहा है। इससे शोषण तथा बेकारी जैसी सामाजिक समस्याओं को बढ़ावा मिल रहा है।

(iv) राष्ट्रवाद कमजोर हुआ वैश्वीकरण के कारण राष्ट्रवाद कमजोर हुआ है तथा उसके ऊपर वैश्विकवाद हाबी हो रहा है। विदेशी पूँजीनिवेश, विश्व बाजार का एकीकरण आदि प्रक्रियाओं ने राष्ट्र राज्य की सीमाओं को शिथिल किया है।

(v) संचार क्रांति और वैश्वीकरण — जनसंचार के अत्याधुनिक साधन वैश्वीकरण के प्रमुख निर्वाहक है। ये दुनिया के एक कोने से दूर के कोने तक तत्काल सूचनायें उपलब्ध करा रहे हैं। इस क्रम में राष्ट्र राज्य की सीमाएँ गौण हो गयी है। विश्व एक ग्राम बन गया है।


4. आधुनिकीकरण क्या है? भारतीय समाज पर आधुनिकीकरण के प्रभावों का वर्णन करें

उत्तर आधुनिकीकरण की प्रक्रिया मूलतः सामाजिक व आर्थिक विकास से संबद्ध है। आधुनिकीकरण एक प्रकार के परिवर्तन का ही दूसरा नाम है। इसका आरम्भ पश्चिम में यूरोपियन समाजों में हुआ, माना जाता है। विद्वानों ने आधुनिकीकरण का परिभाषा अलग-अलग रूप में दी है। कुछ विद्वानों की परिभाषायें निम्नलिखित हैं—

आधुनिकीकरण का प्रभाव—

(i) धार्मिकता में आधुनिकीकरण — भारत में स्वतंत्रता के बाद संविधान के लौकिक

आदशों ने व्यवहार में धार्मिकता की विभिन्न अभिव्यक्तियों ने लौकिकीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा दिया, इन लौकिक आदर्शों द्वारा धर्म का पुन: व्यवस्थापन पर विशेष बल दिया गया था। इससे समाज में विशेष परिवर्तन आया था। भारत की जाति व्यवस्था में नगरीकरण, औद्योगिकीकरण, शिक्षा तथा संवैधानिक प्रयत्नों द्वारा शताब्दियों से स्थापित सामाजिक-धार्मिक निषेधों में भारी परिवर्तन आया।

(ii) जाति व्यवस्था में परिवर्तन — नगरों में खण्डात्मक प्रकार के संबंधों में ऐसी • सामाजिक दशायें उत्पन्न कर दी हैं जिनमें द्वैतीयक प्रकार के संबंधों की स्थापना को प्रोत्साहन • मिला है। वैधानिक प्रयासों के कारण विभिन्न प्रकार की स्वतंत्रताओं ने जातिगत भावना में भारी परिवर्तन ला दिया है। पिछड़ी अनुसूचित जाति एवं जनजातियों को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त होते से जाति व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन आये।

(iii) सामाजिक गतिशीलता यातायात के साधन व्यवस्था में सुधार के कारण सामाजिक गतिशीलता भी बढ़ी तथा सम्पर्क आदि की समस्या लगभग समाप्त हो गयी है। वर्तमान समय में स्थिति यह है कि किसी भी जाति का व्यक्ति किन्हीं भी सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक तथा राजनीतिक अवसरों का लाभ उठा कर अपनी स्थिति में मनचाहा परिवर्तन ला सकता है।

(iv) सांस्कृतिक संघात– भारत में नगरों, बाजारों, कसबों, स्कूलों, रेल, बसों, सड़कों तथा डाकखानों के कारण जिस प्रकार का सांस्कृतिक संघात हुआ है, उसने ग्रामीण समुदायों में नवीन विचारों, नवीन आदर्शों व नवीन विधियों की बाढ़ ला दी है। आधुनिकीकरण ने जातीय संस्करण व्यवस्था में शिथिलता ला दी है जबकि भारत में आधुनिकीकरण के अच्छे लक्षण दिखलाई पड़ते हैं।

(v) सामाजिक क्षेत्र में आधुनिकीकरण — वर्तमान समय में आधुनिकीकरण के परिणामस्वरूप भारत में संयुक्त परिवार व्यवस्था, जाति व्यवस्था तथा ग्रामीण समुदाय पर आधारित परम्परागत सामाजिक संरचना में परिवर्तन आये हैं, परन्तु इनसे उत्पन्न मूल्य व मनोवृत्तियाँ आज भी विस्तृत रूप से फैली हुई हैं। रोजगार के काफी नवीन अवसर उपलब्ध होने लगे हैं।


5. नगरीकरण की अवधारणा की व्याख्या कीजिए तथा भारतीय समाज पर होने वाले उसके प्रभावों का मूल्यांकन करें। 

उत्तर ⇒  नगरीकरण वह प्रक्रिया है, जिसके अनुसार न केवल नवीन नगरों की स्थापना होती है, बल्कि गाँव तथा कसबें भी नगरों का रूप धारण करने लगते हैं। नगरीकरण के संबंध में डेविस के विचार निम्नलिखित हैं

डेविस (Davis) ने लिखा कि, “नगरीकरण एक निश्चित प्रक्रिया है, परिवर्तन का वह चक्र, है, जिससे कोई समाज कृषक से औद्योगिक समाज में परिवर्तित होता है। “

भारतीय समाज पर नगरीकरण का प्रभाव — नगरीकरण की प्रक्रिया भारतीय समाज को कई रूपों में प्रभावित करती है, इन प्रभावों को निम्नलिखित रूपों में देखा जा सकता है

(i) दृष्टिकोण की व्यापकता — नगरीकरण के परिणामस्वरूप विभिन्न प्रदेशों के भिन्न-भिन्न रीति-रिवाजों, परम्पराओं के लोग एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं। जिससे उसका दृष्टिकोण व्यापक होता चला जाता है।

(ii) आत्मनिर्भरता की भावना का विकास नगरों में सामुदायिक भावना के क्षीण होने के कारण वहाँ व्यक्ति को अपने ऊपर ही निर्भर रहना पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप उसमें आत्मनिर्भरता तथा आत्मविश्वास की भावना विकसित होती है।

(iii) अनुकूलन क्षमता में वृद्धि — नगरीय जीवन विविधतापूर्ण तथा अनेक भिन्नताओं से युक्त होता है। विभिन्न धर्मो, भाषाओं, रीति-रिवाजों आदि के लोगों को एक साथ रहना पड़ता ह • जिसके फलस्वरूप उनमें एक-दूसरे के साथ सामंजस्य स्थापित करने की क्षमता में वृद्धि होती है।

(iv) अंधविश्वासों की समाप्ति — नगरीय जीवन में परम्पराओं तथा रूढ़ियों की शक्ति क्षीण होती है। वहाँ व्यक्ति आधुनिक विचारों के संपर्क में निरंतर आता रहता है। ऐसी स्थिति में अंधविश्वासों की समाप्ति तथा तार्किक चिन्तन का विकास होना स्वाभाविक है।

(v) स्त्रियों की सामाजिक स्थिति में सुधार — नगरों में अधिकतर परिवार एकांकी होते हैं। अधिकतर परिवारों में पति-पत्नी दोनों को ही नौकरी करनी पड़ती है, जिसके कारण स्त्रियों का शिक्षित होना आवश्यक समझा जाता है। ऐसी स्थिति में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति में सुधार होना आवश्यक है।


6. राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 2000 की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?

उत्तर भारत का जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में दूसरा स्थान है। सन् 2001 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या 102.70 करोड़ थी। ऐसा अनुमान है कि मार्च, 2016 तक भारत की जनसंख्या 126.35 करोड़ हो सकती है। जनसंख्या वृद्धि की दर को कम करने के अनेक प्रयत्न किये जा रहे हैं।

1975-76 में एक राष्ट्रीय नीति का निर्माण किया गया जिसमें जन्म दर को कम करने के विभिन्न उपायों पर जोर दिया गया। जनसंख्या नीति, 2000 में जनसंख्या को स्थिर रखने के संबंध में नई नीति की घोषणा की गई। इसकी प्रमुख बातें निम्नलिखित हैं—

 (i) अशोधित जन्मदर, कुल प्रजनन दर, अशोधित मृत्युदर के साथ-साथ मातृ मृत्यु दर को विकास के धारणीय स्तर तक कम करना।

(ii) प्रजनन तथा शिशु स्वास्थ्य की देखभाल हेतु सुविधाएँ देना।

(iii) जनसंख्या शिक्षा के प्रसार पर बल देना तथा 14 वर्ष की आयु तक विद्यालयी शिक्षा को अनिवार्य बनाना।

(iv) विवाह की आयु को बढ़ाना तथा बाल विवाह प्रतिबंध अधिनियम, 1976 को कठोरता से लागू करना ।

(v) बच्चों के लिए सर्वव्यापक प्रतिरक्षण कार्यक्रम के लक्ष्य को प्राप्त करना ।

(vi) प्रजनन को कम करने से संबंधित उपायों की सूचना, परामर्श और सेवाओं को सब तक पहुँचाना।

(vii) एड्स के प्रसार को नियंत्रित करना तथा कई अन्य संक्रामक रोगों को प्रतिबंधित और नियंत्रित करना।

(viii) प्रजनन और शिशु स्वास्थ्य सेवा को भारतीय चिकित्सा पद्धति में एकीकृत करना।

(ix) कुल प्रजनन दर को कम करने के लिए छोटे परिवार मानदंड को बढ़ावा देना।

(x) जनसंख्या के जनकेंद्रित कार्यक्रम के विचार को बढ़ावा देना तथा सामाजिक विकास और रूपांतरण को समस्त प्रक्रिया का एक अंग बनाना।

BSEB 12th Sociology Important Question Answer


7. अधिक जनसंख्या का समाज पर पड़ने वाले प्रभावों की विवेचना करें।

उत्तर भारत में बढ़ती हुई जनसंख्या ने अनेक सामाजिक, आर्थिक एवं प्रशासनिक कठिनाइयाँ पैदा कर दी है। अधिक जनसंख्या के कारण समाज पर विभिन्न प्रभावों को निम्नलिखित रूप में देखा जा सकता है-

(i) जनसंख्या वृद्धि और आर्थिक विकास प्रो० कोलिन क्लार्क जनसंख्या वृद्धि को देश के आर्थिक विकास के लिए हानिकारक मानते हैं क्योंकि बचत का अधिकांश भाग जनसंख्या पर खर्च होने से शुद्ध राष्ट्रीय आय एवं प्रतिव्यक्ति आय बहुत ही कम रह जाती है।

(ii) जनसंख्या वृद्धि और खाद्य समस्या — जनसंख्या में तीव्र वृद्धि होने पर पिछड़े एवं विकासशील राष्ट्रों में जनसंख्या की माँग के अनुरूप पूर्ति नहीं हो पाती है। अतः वहाँ भुखमरी की समस्या उत्पन्न होती है और विदेशों से अनाज मँगाना पड़ता है।

(iii) जनसंख्या वृद्धि और शिक्षा —  जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ पिछड़े राष्ट्रों में निरक्षरों की संख्या बढ़ने की आशंका अधिक रहती है। पढ़ाई की आयु के बच्चों की संख्या अधिक हो जाती है। अतः जनसंख्या वृद्धि शिक्षा के विस्तार की समस्या खड़ी कर देती है।

(iv) जनसंख्या वृद्धि और आवास समस्या — जनसंख्या वृद्धि होने पर लोगों को बसान और उनके लिए स्वास्थ्यप्रद मकानों की व्यवस्था करने की समस्या पैदा होती है। लोग काफी संख्या में गाँवों से शहरों में आते हैं तथा यहाँ गन्दी बस्तियाँ एवं आवास की समस्या को बढ़ाने में योग देते हैं।

(v) जनसंख्या वृद्धि एवं बेकारी — बढ़ती जनसंख्या किसी देश में बेकारी, अर्द्ध-बेकारी एवं छिपी- बेकारी को जन्म देती है। जनसंख्या तो बढ़ती है किन्तु उसकी तुलना में उपलब्ध साधनों एवं पूँजी आदि की कमी के कारण अतिरिक्त श्रम की खपत नहीं हो पाती है जिसके कारण बेकारी बढ़ जाती है।

(vi) परिवार का विघटन परिवार में सदस्यों की संख्या बढ़ने पर नियंत्रण की भी समस्या पैदा हो जाती है। माता-पिता परिवार के सदस्यों के भरण-पोषण की व्यवस्था के लिए घर से बाहर अर्जन करने चले जाते हैं तथा बच्चे नियंत्रण के अभाव में मनमानी करने लगते हैं। पारिवारिक मूल्यों की अवहेलना की जाती है, सदस्यों में निराशा पैदा होती है और सत्ता की उपेक्षा होने लगती है। ये सभी परिस्थितियाँ परिवार में विघटन पैदा करने के लिए उत्तरदायी हैं।


8. जनांकिकी क्या है? जनांकिकी के महत्त्व की विवेचना करें।

उत्तर ⇒  जनांकिकी शब्द का प्रयोग सबसे पहले सन् 1855 में गुईलाई ने किया था। जनांकिकी अंग्रेजी शब्द Demography का हिन्दी रुपांतरण है। शाब्दिक रूप से डेमोग्राफी दो शब्दों से मिलकर बना है। पहला शब्द है डेमस (Demus) तथा दूसरा शब्द ग्राफी (Graphy) ) है। पहले शब्द का अर्थ जनसंख्या से है जबकि दूसरे शब्द का अर्थ विवरण देने वाले विज्ञान से है। इस प्रकार शाब्दिक रूप से डेमोग्राफी वह विज्ञान है जो एक विवरण के रूप में जनसंख्या संबंधी विशेषताओं को स्पष्ट करता है।

जनांकिकीय का महत्त्व (Importance of Demography)—

जनांकिकीय के महत्त्व को निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है

(i) कोई भी देश अपनी जनसंख्या, विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या के घनत्व, जन्म-दर, मृत्यु-दर, प्रवास की दर तथा लिंग अनुपात को समझे बिना सही कार्यक्रमों और नीतियों का निर्माण नहीं कर सकता।

  (ii) जनसंख्या किसी भी समाज के सामाजिक आर्थिक विकास का केन्द्र होता है। इसी के आधार पर हम अपने साधनों का सही मूल्यांकन कर सकते हैं। जनांकिकी जनसंख्या के स्तर को समझने में अधिक सहयोग देता है।

 (iii) समाज वर्तमान में आधुनिकता की ओर तेजी से बढ़ रहा है। जब हम विभिन्न उद्योगों व्यवसायों और सेवाओं में लगी हुई जनसंख्या का अवलोकन करते हैं तभी उसके आधुनिकीकरण की वास्तविक दशा को समझा पाते हैं।

 (iv) सभी समाजों में रोजगार मनुष्य की मौलिक आवश्यकता है। जनसंख्या की विशेषताओं की जानकारी के बाद रोजगार के अवसर बढ़ाने में सुविधा मिलती है।

(v) जनसंख्या में हो रही वृद्धि के आधार पर हम भविष्य में जनसंख्या के आकार का अनुमान लगाकर उसी के आधार पर योजनाए तैयार किया जाए।

(vi) किसी भी समाज में जब जनसंख्या के घनत्व, जन्म-दर, मृत्यु दर, तथा प्रवास संबंधी विशेषताओं में परिवर्तन होता है तब सामाजिक संगठन में भी परिवर्तन होने लगता है। इसी प्रकार के संगठन को बढ़ाने के लिए जनांकिकी विशेषताओं को समझना आवश्यक है।

 (vii) समाज में परिवर्तन के अनेक सामाजिक कारण होते हैं लेकिन इन कारणों में जनसंख्यात्मक दशाएँ महत्त्वपूर्ण हैं।

  (viii) जनसंख्या संबंधी विशेषताएँ सामाजिक संस्थाओं, व्यक्ति के व्यवहारों और सामाजिक दशाओं को बहुत अधिक प्रभावित करता है। जिससे समाज में अनेक प्रकार की नवीन समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। जनांकिकी की सहायता से ऐसी समस्याओं को कम करने का प्रयास किया जाता है।


9. आधुनिक भारत में स्त्रियों की स्थिति की विवेचना करें। 

उत्तर ⇒  ब्रिटिश शासनकाल में ही समाज सुधार आंदोलन शुरू हो गये थे जिनका प्रभाव स्त्रियों की स्थिति पर पड़ा, परन्तु स्वतंत्रता के बाद स्त्रियों में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। आधुनिक भारत में स्त्रियों की स्थिति को निम्नलिखित रूप में देखा जा सकता है –

  (i) परिवारिक स्थिति (Family status)— आधुनिक भारत में स्त्रियों को पारिवारिक क्षेत्र में बहुत से अधिकार प्राप्त हो गये हैं। विवाह संबंधी निर्योग्यता समाप्त हो गई है। बाल विवाह प्रतिबंध हटा दिया गया है। विधवा विवाह और अंतर्जातीय विवाह को मान्यता मिल गई है। बहुपत्नी विवाह को भी बंद कर दिया गया है। प्रत्येक कार्य में तथा निर्णय में उनके विचारों व इच्छाओं को महत्त्व दिया जाता है। विवाह विच्छेद का प्रावधान हो जाने से स्त्रियों को अपने दुराचारी तथा अन्यायी पति से छुटकारा मिल जाता है।

 (ii) आर्थिक स्थिति ( Economic status)— पहले स्त्रियों को सम्पत्ति पर कोई अधिकार नहीं था, लेकिन 1956 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम पारित हुआ जिसके अनुसार स्त्रियों को भी अपनी पुश्तैनी सम्पत्ति में अधिकार मिला है। अब स्त्रियों का आर्थिक कार्य करना अनैतिक अथवा बुरा नहीं समझा जाता। आज सभी क्षेत्रों में स्त्रियाँ कार्य करने लगी हैं।

(iii) शैक्षणिक स्थिति (Educational status) – शिक्षा बौद्धिक विकास के लिए आवश्यक होता है। ब्रिटिश शासनकाल से ही स्त्री शिक्षा की शुरुआत हो गयी। स्वतंत्रता के बाद इसमें काफी प्रसार हुआ। लोग लड़कियों की शिक्षा का महत्त्व मझने लगे। गह-जगह स्कूल और कॉलेज खुलने लगे। तरह-तरह के प्रशिक्षण केन्द्र खुल गये जहाँ से प्रशिक्षण प्राप्त कर संबंधित धंधों में स्त्रियाँ काम करने लगी हैं। आज विभिन्न शैक्षणिक केन्द्रों एवं संस्थाओं में स्त्रियों के लिए सीटों का आरक्षण भी है।

(iv) राजनैतिक स्थिति (Political status) – स्वतंत्रता के बाद स्त्रियाँ राजनैतिक क्षेत्र में सक्रिय भाग लेने लगी हैं। महात्मा गाँधी के प्रयास से स्त्रियों में सामूहिक रूढ़ियों का अंत हुआ और वे खुलकर मैदान में पुरुषों के समान कंधे से कंधा मिलाकर काम करने लगी। आज ग्राम पंचायत, पंचायत समिति एवं जिला परिषद में स्त्रियों के लिए पद आरक्षित कर दिये गये हैं। स्त्रियों को मतदान में समान अधिकार दिया गया है। स्त्रियों में बढ़ती हुई राजनैतिक चेतना उन्हें अधि कारों के प्रति सजग तथा जागरूक बना रही है। इससे उनकी स्थिति में पहले की अपेक्षा काफी सुधार हुआ है।

Sociology Class 12 Question and Answer 2024 in Hindi


10. पंचायती राज व्यवस्था क्या है ? ग्रामीण विकास में इसकी भूमिका को स्पष्ट करें। 

उत्तर लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण और विकास कार्यक्रमों में जनता का सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य से पंचायती राज की शुरुआत की गई। ‘पंचायती राज व्यवस्था’ की तीन सीढ़ियाँ होती हैं। ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, प्रखण्ड स्तर पर पंचायत समिति या जनपद पंचायत और जिला स्तर पर जिला परिषद या जिला पंचायत ।

जनता की भागीदारी पंचायती राज की समस्त व्यवस्था का मूल तत्त्व है और पंचायती राज को लोकतंत्र का मूल आधार तभी कहा जा सकता हैं, जब इन संस्थाओं का गठन तथा समस्त  कार्य संचालन लोकतंत्रीय आधार पर हो ।

इस प्रसंग में 1993 ई० में पंचायती राज के संबंध में 73वाँ संवैधानिक संशोधन अधिनियम पारित किया गया।

      पंचायती राज का ग्रामीण विकास में निम्नलिखित भूमिका हैं

(i) पंचायती राज द्वारा गाँव स्तर की उपयोगी योजनाएँ ग्राम पंचायत द्वारा तैयार की जाती हैं, जबकि जिला परिषद द्वारा उन्हें स्वीकार करके उनके लिए आर्थिक साधन उपलब्ध कराती है। विकास की जिम्मेदारी स्थानीय नेतृत्व के हाथों में होती है।

  (ii) गाँवों का विकास किसी विशेष जाति के आनुवंशिक मुखिया द्वारा नहीं किया जाता है बल्कि ग्रामीणों द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है। पंचायती राज संस्थाएँ ग्रामीणों को स्वयं समस्याओं के समाधान का तरीका बताती हैं। इससे एक नए ग्रामीण नेतृत्व का विकास हुआ है।

  (iii) पंचायती राज व्यवस्था ग्रामीणों के जीवन सुधार लाने में अहम् भूमिका अदा करती है। विभिन्न विकास कार्यक्रमों के द्वारा कृषि उत्पादन वृद्धि, सिंचाई की सुविधा बेहतर तथा पशुओं की नस्ल में सुधार हुआ है। इन सभी दशाओं ने ग्रामीणों की मनोवृत्तियों में भी परिवर्तन पैदा किया है।

 (iv) पंचायत राज संस्थाएँ ग्रामीणों के स्वास्थ्य के लिए विशेष प्रयत्न करती हैं। इन प्रयत्नों के प्रभाव से मातृत्व और शिशु कल्याण को प्रोत्साहन मिला है।

(v) प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की व्यवस्था करना पंचायती राज संस्थाओं के प्रमुख कार्य हैं। इस क्षेत्र में पंचायती राज का योगदान सराहनीय रहा है।

(vi) सस्ता और शीघ्र न्याय देने में ग्रामीण स्तर की न्याय पंचायतों का विशेष योगदान माना जाता है।


11. राजनीतिक दल क्या है? राजनीतिक दलों के कार्यों की विवेचना करें।

उत्तर प्रजातान्त्रिक देशों में राजनीतिक दल जीवन व्यवहार का अंग बन गए हैं। राजनीतिक चेतना का प्रसार करने में इनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण हैं। राजनीतिक दल की परिभाषा की चर्चा करते हुए —

मेकाइवर तथा पेज (Mc Ivers& Page) के अनुसार — “राजनीतिक दल वह समुदाय है जो किसी विशेष सिद्धांत या नीति के समर्थन के लिए संगठित किया गया है, और जो संवैधानिक उपायों से उस सिद्धांत अथवा नीति के शासन का आधार बनाने का प्रयत्न कर रहा है। “

  राजनीतिक दल के कार्यों को निम्नलिखित रूप में देखा जा सकता है—

(i) सार्वजनिक नीतियों का निर्धारण — राजनीतिक दल जनता का समर्थन प्राप्त करने के लिए अपनी नीतियों और योजनाओं का जोरदार प्रचार करते हैं। वे राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं के विभिन्न पहलुओं से जनता को परिचित कराते हैं। इसलिए राजनीतिक दलों का ‘विचारों का दलाल’ कहा जाता है।

 (ii) शासन का संचालन — राजनीतिक दल चुनाव में बहुमत प्राप्त करके सरकार का निर्माण करते हैं। अपने दल से ही मंत्री नियुक्त करते हैं तथा विभिन्न विधियों से अपने चुनाव घोषणा-पत्र के वायदों को पूरा करने का प्रयास करते हैं।

(iii) शासन की आलोचना —  यदि निर्वाचन में किसी दल को बहुमत प्राप्त न हो तो वह प्रतिपक्ष के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है। प्रतिपक्ष के रूप में उसका यह कर्तव्य हो जाता है कि वह शासन को सचेत रखे। वह सरकार की रचनात्मक आलोचना करके वैकल्पिक नीतियाँ प्रस्तुत करता है।

(iv) चुनावों का  संचालन — राजनीतिक दलों से ही चुनावों की सार्थकता प्रकट होती है। वे चुनाव के समय अपने चुनाव घोषणापत्र तैयार करते हैं, उसका प्रचार करते हैं, प्रत्याशियों को खड़ा करने तथा हर तरीकों से चुनाव जीतने का प्रयत्न करते हैं।

(v) शासन तथा जनता के बीच मध्यस्थ का कार्य राजनीतिक दल जनता और सरकार के बीच मध्यस्थता करते हैं। वे जनता की समस्याओं और आकांक्षाओं को सरकार के सामने रखते हैं और सरकार की स्थिति से जनता को अवगत कराते हैं।

(vi) दलीय कार्य— प्रत्येक राजनीतिक दल कतिपय दल सम्बन्धी कार्य भी करता है मतदाताओं को दल का सदस्य बनाता है, सार्वजनिक सभाओं का आयोजन करता है, दल के लिए चन्दा इकट्ठा करता है, आदि।


12. प्रजातांत्रिक व्यवस्था की भारतीय राजनीतिक दलों के संदर्भ में व्याख्या कीजिए।

उत्तर भारत एक प्रजातांत्रिक राज्य है। इसने 26 जनवरी, 1950 को गणतन्त्रीय व्यवस्था को अपनाकर अपने द्वारा निर्मित संविधान को अपने पर लागू किया। इस संविधान से संघात्मक व्यवस्था तथा वयस्क मताधिकार द्वारा समस्त राजनीतिक शक्ति का स्रोत वयस्कों में निहित किया गया। तब से आज तक यहाँ पर केन्द्र तथा राज्यों में राजनीतिक दल चुनाव लड़ते आ रहे हैं और मत शक्ति के आधार पर सत्ता का उपयोग करते रहे हैं।

 प्रजातंत्र का अर्थ — प्रजातंत्र की सर्वाधिक लोकप्रिय परिभाषा अब्राहम लिंकन की है। इनके अनुसार ‘जनता के लिए, जनता द्वारा, जनता का शासन

संविधान जनता के समक्ष अनेक विकल्प प्रस्तुत करके निर्वाचन की स्वतन्त्रता द्वारा समरूप प्रतिनिधित्व का प्रावधान करता है।

भारत में प्रजातंत्र भारत में भारतीय गणतांत्रिक संविधान के अनुसार पहले आम चुनाव 1952 में हुए थे। उस समय तक भारत में स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय भाग लेने के कारण कांग्रेस प्रभावशाली थी। उस समय तक मान्यताओं तथा आदर्शों में मतभेद होने के कारण भारतीय जनसंघ, प्रजा समाजवादी दल, हिन्दू महासभा, स्वतन्त्र पार्टी आदि राजनीतिक दलों का निर्माण हुआ। इन राजनीतिक दलों ने प्रजातंत्रीय राजनीतिक प्रणाली के माध्यम से अपने अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयत्न किया। भारत एक संघीय प्रजातंत्र है। यहाँ पर केन्द्र तथा राज्यों के मध्य शासन की शक्तियों का बँटवारा है।

भारत में दलीय लोकतंत्र 1977 से पहले तक विघटित रहा है। आपात्काल में विरोधी दलों का संगठित होने का अवसर मिला और जनता पार्टी को जिताया। लेकिन फिर भारतीय लोकतंत्र पुनः विघटन का युग आरम्भ हुआ। यह कई दलों में विघटित हो गया। आज पुनः कांग्रेस के विरुद्ध जनतांत्रिक आधार पर विरोध जारी है। वह सत्ता को केन्द्र विरोध तथा अपने में समेटने के लिए प्रयत्नशील है।

बदलती परिस्थितियों ने भारतीय प्रजातंत्र में वंशवाद का विरोध किया, समाज के श्रेष्ठजनों की मानसिकर्ता का विरोध करते हुए पुनः कांग्रेस शासन को समाप्त करके मोर्चा सरकार द्वारा जनतंत्र में नैतिकता का विकास करने का संकल्प लेकर क्रियाशील है। 1977 के बाद भारतीय प्रजातंत्र प्रयोगों का प्रजातंत्र हो गया, जनता दल की सरकार बनी। पिछड़े और अगड़ों का संघर्ष रहा। फिर कांग्रेस आई। फिर भारतीय जनता पार्टी के हिन्दूत्व को बहुमत मिला तथा कई दलों की मिलीजुली सरकार ने केन्द्र में पाँच वर्ष तक शासन किया, लेकिन बाद के ने चुनाव इस सरकार को नकार दिया तथा पिछले दिनों तक कांग्रेस के नेतृत्व में कई दलों के सहयोग से केन्द्र में यू०पी०ए० नाम से सरकार चली। लेकिन सोलहवीं लोकसभा 2014 के चुनाव में जनता में जनता कांग्रेस के यू०पी०ए० सरकार को नकार दिया। और भारतीय जनता पार्टी (एन०डी०ए०) को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत देकर सत्ता में स्थापित कर दिया।

12th Sociology Book Solution Bihar Board 


Class 12th Sociology ( लघु उत्तरीय प्रश्न )
 UNIT – ISociology ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 1
 UNIT – IISociology ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 2
 UNIT – IIISociology ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 3
 UNIT – IVSociology ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 4
 UNIT – VSociology ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 5
 UNIT – VISociology ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 6
 UNIT – VIISociology ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 7
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Abhi Kumar

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