BSEB 12th Biology Subjective

BSEB 12th Biology Subjective Question 2024 | Biology Ka Important Question 12th Class

Class 12th biology

BSEB 12th Biology Subjective Question :-  दोस्तों यदि आप 12th Biology Hindi Medium Questions की तैयारी कर रहे हैं तो यहां पर आपको BSEB Class XII Biology Question दिया गया है जो आपके Biology Ka Important Question 12th Class के लिए काफी महत्वपूर्ण है | Class 12th Biology Questions 2024


BSEB 12th Biology Subjective Question 2024

1.संक्षेप में बताइए

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(क) पी सी आर

(ख) प्रतिबंधन एंजाइम और डीएनए

(ग) काइटिनेज

उत्तर ⇒ (क) पी सी आर- पी सी आर का अर्थ पॉलिमरेज चेन रिऐक्शन (पॉलमरेज श्रृंखला अभिक्रिया) है। इस अभिक्रिया में उपक्रमको (प्राइमर्स — छोटे रासायनिक संश्लेषित अल्पम्यूक्लियोटाइड जो डीएनए क्षेत्र के पूरक होते हैं) के दो समुच्चयों (सेट्स) व डीएनए पॉलिमरेज एंजाइम  का उपयोग करते हुए पात्रे (इन विट्रो) विधि द्वारा उपयोगी जीन के कई प्रतिकृतियों का संश्लेषण होता है। यह एंजाइम जिनोमिक डीएनए को टेपलेट के रूप में काम में लेकर अभिक्रिया से मिलने वाले न्यूक्लियोटाइडों का उपयोग करते हुए उपक्रमकों को विस्तृत कर देता है यदि डीएनए प्रतिकृतयेन प्रक्रम कई बार दोहराया जाता है, तब डीएनए खंड को लगभग एक अरब गुना प्रवर्धित किया जा सका है।

(ख) प्रतिबंधन एंजाइम और डीएनए— आणविक कैची कहे जाने वाले प्रतिबंधन एंजाइम (रिस्ट्रिक्सन एंजाइम) की खोज से डीएनए को विशिष्ट जगहों पर काटना संभव हो सका। कटे हुए डीएनए का भाग प्लाज्मिड डीएनए से जोड़ा जाता है। यह प्लाज्मिड डीएनए संवाहक (वेक्टर) की तरह कार्य करता है जो इससे जुड़े डीएनए को स्थानांतरित करता है। प्रतिजैविक प्रतिरोधी जीन को संवाहक के साथ जोड़ने का काम एंजाइम डीएनए लाइगेज के द्वारा होता है जो डीएनए अणु के कटे हुए भाग पर कार्य कर उसके किनारों को जोड़ने का काम करता है। इस संयोजन से पात्रे (इन विट्रो) नये गोलाकार स्वतः प्रतिकृति बनाने वाले डीएनए का निर्माण होता है जिसे पुनर्योगज डीएनए कहते हैं। जब यह डीएनए एरिकोओ कोलाई में स्थानांतरित किया जाता है तो यह नए परपोषी के डीएनए पॅलिमरेज एंजाइम का उपयोग कर अनेक प्रतिकृतियाँ बना लेता है। प्रतिजैविक प्रतिरोध जीन की प्रति का ई. कोलाई का गुणन, ई. कोलाई में प्रतिजैविक प्रतिरोधी जीन की क्लोनिंग कहलाती है।

(ग) काइटिनेज – काइटिनेज एक प्रकार का एंजाइम है।


2.निम्नलिखित के अंतर स्पष्ट करें :

(क) प्लाज्मिड डीएनए और गुणसूत्रीय डीएनए

(ख) आरएनए और डीएनए

 (ग) एक्सोन्यूक्लिएज और एंडोन्यूक्लिएज

उत्तर ⇒ (क) प्लाज्मिड डीएनए और गुणसूत्रीय डीएनए में अंतर— अनेक जीवाणुओं में मुख्य गुणसूत्र के अतिरिक्त कुछ डीएनए के अतिरिक्त गुण होते हैं जिनमें आनुवंशिक सूचना निहित होती है। डीएनए के अणु प्लाज्मिड कहलाते हैं। इनमें स्वतंत्र रूप से प्रतिकृतिकरण (replication) की क्षमता होती है। आनुवांशिक प्रौद्योगिकी में प्लाज्मिड का महत्त्वपूर्ण योगदान है। गुणसूत्रों के डीएनए में ही आनुवंशिक लक्षणों की रूपरेखा संकेतों के रूप में निहित होती है इन्हीं संकेतों के आधार पर दूत आरएनए का संश्लेषण होता है, जिससे प्रोटीन अणुओं का निर्माण होता है। यही प्रोटीन शरीर की संरचना एवं क्रियाशीलता में (एंजाइम के रूप में) महत्त्वपूर्ण भाग लेते हैं।

(ख) आरएनए और डीएनए में अंतर— डीएनए में इसमें डीऑक्सीराइबोज शुगर होती है। इसमें एडेनिन तथा थाइमिन होता है। दो रज्जुक होते हैं जो समान प्रकार के ही रहते हैं। आरएनए में राइबोज शुगर होती है। इसमें एडेनिन तथा यूरेसिल होता है। इसमें DNA का एक रज्जुक ही ट्रांसक्रिप्शन के काम में प्रयोग किया जाता है। ट्रांसक्रिप्शन कार्य के पूरा हो जाने पर DNA के दोनों रज्जुक फिर कुंडलिनी बना लेते हैं। RNA पॉलिमरेज को किसी प्राइमर की आवश्यकता नहीं होती।

(ग) एंडोन्यूक्लिएज और एक्सोन्यूक्लिएज में अंतर— एडोन्यूक्लिएज एक्सोन्यूक्लिएज डीएनए के सिरे में न्यूक्लियोटाइड को अलग करते हैं, जबकि एंडोन्यूक्लिएज डीएनए को भीतर विशिष्ट स्थलों पर काटते है।


3.जेनेटिक इंजीनियरिंग और जैव तकनीक से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ न्यूक्लिक अम्लों और प्रोटीनों के रसायन के ज्ञान से प्रोटीन के संश्लेषण को नियमित करना संभव हो सका है। न्यूक्लिक अम्लों में प्रोटीन विशिष्ट क्षार द्वारा कोडेड (coded) होती हैं DNA क्रम जो विशिष्ट प्रोटीन 1 के लिए कोड का कार्य करता है उसे जीन (gene) कहते है एक जीव के | DNA अणु के एक भाग को यदि दूसरे जीव के DNA अणु के साथ जोड़ दिया जाए तो इस नए बने हुए DNA अणु को पुनर्योजित DNA (recombinant DNA) कहा जाता है। जेनेटिक इंजीनियरों ने कुछ विशिष्ट एंजाइमों की सहायता से ऐसा करके बता दिया है। इन विशिष्ट एंजाइमों को ‘नियंत्रण एंजाइम’ (restriction enzymes) कहा जाता है। पुनर्योजित DNA की संरचना में परिवर्तन के साथ प्रोटीनों या एंजाइमों के संश्लेषण के लिए प्रयोग किया जाता है।

                            जीवों के जीन्स (genes) की संरचना में परिवर्तन करके मनुष्य में लाभदायक प्रभाव उत्पन्न करने की कृत्रिम विधि को जेनेटिक इंजीनियरिंग अथवा जैव तकनीक कहा जाता है।

जैव तकनीक हमारी सहायता करती है

(i) प्रोटीन में एमीनो अम्ल का क्रम बदलने में, जिससे परिवर्तित और ऐच्छिक गुणों के प्रोटीन उत्पन्न किए जा सकें।

(ii) लाभदायक प्रोटीन और एंजाइम, व्यापारिक अनुप्रयोग के लिए कोशिकाओं से अधिक मात्रा में उत्पन्न करने के लिए जैव तकनीक, जेनेटिक इंजीनियरिंग के क्षेत्र को बढ़ाती है। अत्यंत सावधानीपूर्वक व नियंत्रित परिस्थितियों में वैज्ञानिकों द्वारा DNA अणुओं के क्षारों के क्रम को बदलने की तकनीकी को जैव तकनीकी (biotechnology) कहते हैं।


4.DNA की प्राथमिक संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ DNA की प्राथमिक संरचना (Primary Structure of DNA) जिस प्रकार प्रोटीन की प्राथमिक संरचना, प्रोटीन में एमीनो अम्ल के क्रम पर निर्भर करती है, उसी प्रकार न्यूक्लिक अम्ल में न्यूक्लिक अम्ल की संरचना न्यूक्लिओटाइड के क्रम पर निर्भर करती है। प्रोटीन में जोड़ने वाला बंधन एमाइड बंधन है, जबकि न्यूक्लिक अम्ल में यह फॉस्फोटिक डाइएस्टर बंधन है। फॉस्फेट ऐस्टर 3-OH पर मुक्त – OH को एक पेंटोस शर्करा की 5′-OH के साथ जोड़ता है। इस प्रकार, न्यूक्लिक अम्ल एक फॉस्फेट एस्टर बंध द्वारा जुड़े हुए शर्करा अणु श्रृंखला का मेरुदंड (Back bone) बनाते हैं, जिससे धार अणु शाखाओं के रूप में जुड़े रहते है। विषम चक्रीय क्षार श्रृंखला के साथ नियमित अंतराल के बाद जुड़े हुए होते हैं, जैसा कि नीचे दिखाया गया है—

न्यूक्लिक अम्ल में न्यूक्लिओटाइडों का क्रम 5-सिरा और क्षार की प्राप्ति के अनुसार पहचान से आरम्भ करके वर्णन किया गया है। इस प्रकार DNA में क्षारों का क्रम निम्न प्रकार से दिखाया जा सकता है –


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5.न्यूक्लिक अम्लों के कार्यों का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ न्यूक्लिक अम्लों के कार्य (Functions of Nucleic Acids) न्यूक्लिक अम्लों के दो मुख्य कार्य है

(i) प्रतिकृतित्व (Replication)

(ii) प्रोटीन संश्लेषण (Protein synthesis)

(i) प्रतिकृतित्व (Replication)—– जैव अणु (Biomolecule) का गुण है. अपने जैसे अणु को संश्लेषित करना DNA अणुओं में यह प्रतिकृतित्व का गुण होता है। DNA अणुओं में विद्यमान क्षारकों का क्रम ही जेनेटिक सूचनाओं का आधार है, जिससे पैतृक गुण अपनी संतित में आते हैं। कोशिका विभाजन के साथ नाभिक और DNA का विभाजन होता है और दोनों नई पुत्री कोशिका में पैतृक गुणों की पुनरावृत्ति हो इसके लिए आवश्यक है कि DNA अणुओं का विभाजन इस प्रकार हो कि दोनों पुत्री नाभिकों में DNA के क्षारों का क्रम बिल्कुल समान हो। DNA अणुओं में यह गुण ही उनका प्रतिकृतित्व कहलाता है। इस प्रक्रिया में DNA की डबल हेलिक्स पहले धीरे धीरे खुलती है और इस प्रकार पृथक हुई दो इकाईयाँ, दो नई इकाईयों को संश्लेषित करने के लिए प्रेरित करती है। एक इकाई के प्रत्येक क्षार के सामने उसके पूरक क्षारक के निर्माण के साथ न्यूक्लिओटाइडों का निर्माण होता जाता है तथा प्रत्येक इकाई डबल हेलिक्स बनाती जाती है। इस प्रकार एक DNA अणु से उसके दो प्रतिरूप दो प्रतिकृतियाँ तैयार हो जाती हैं, प्रतिकृत तंतुओं में क्षारों का सही क्रम चित्र में दिखाया गया है।

(ii) प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis )- DNA अणुओं में क्षारक क्रम के रूप में समस्त जेनेटिक सूचनाएँ इकट्ठी रहती है और उन्हीं के निर्देशानुसार प्रोटीनों का संश्लेषण होता है। प्रोटीनों का संश्लेषण दो पदों में संपन्न होता है—

(a) अनुलेखन (Transcription)

(b) अनुवाद या स्थानांतरण (Translation)

अनुलेखन (Transcription) में DNA अणु के क्रम की एकल में पूरक RNA अणु बनता है जिसे संदेशवाहक RNA (mRNA) कहा जाता है। यह प्रक्रिया उसी प्रकार संपन्न होती है जैसी प्रतिकृतित्व के दौरान DNA के निर्माण में हुई, बस एक अंतर यह है कि DNA में ऐडिनीन (A) का पूरक थाइमीन था जबकि RNA में थाइमीन (T) के स्थान पर यूरेसिल (U) होता है।

पूरक क्षार जोड़े निम्न प्रकार से है

   DNA                                                                        mRNA

    ऐडिनीन (A)                                                                 यूरेसिल (U)

   गुआनीन (G)                                                               साइटोसीन (C)

  साइटोसीन (C)                                                              गुआनीन (G)

   थाइमीन (T)                                                                   एडीनीन (A)

अनुलेखन के बाद m-RNA कोशिका नाभिका से कोशिकाद्रव्य में राइबोसोम पर चला जाता है, वहाँ ये प्रोटीन संश्लेषण के लिए साँचे (template) का काम करता है।

m-RNA के अणुओं के न्यूक्लिओटाइडों को तीन के क्रम में बढ़ते हैं और इस प्रकार के प्रत्येक त्रियक (Triplet) को एक कोडोन (coden) कहते हैं। प्रत्येक कोडोन एक एमीनो अम्ल से संबद्ध होता है। ये m-RNA अणु tRNA व राबोसोमल कणों के माध्यम से प्रोटीन संश्लेषण को नियंत्रित करते है। जिस 1-RNA के न्यूक्लिओटाइड m-RNA से मेल खाते जाएँगे वही एमीनो अम्ल – RNA द्वारा प्रोटीन श्रृंखला से पेप्टाइड बंध द्वारा जुड़ते जाएँगे और इस प्रकार पॉलिपेप्टाइड श्रृंखला बढ़ती जाएगी। प्रत्येक एमीनो अम्ल में कम से कम एक सुसंगत 1-RNA होता है। 1-RNA अणु के एक सिरे पर एक ट्राइन्यूक्लिओटाइड धार क्रम होता है अर्थात् m. RNA (एन्टिकोडोन) पर किसी ट्राइन्यूक्लिओटाइड क्षार क्रम का पूरक -RNA अणु का दूसरे सिरे पर तीन न्यूक्लिओटाइड का एक विशिष्ट क्षार कम होता है—CCA, सिरे पर ऐडिनीन न्यूक्लिओटाइड पर प्रदर्शित शर्करा परOH समूह के साथ (एमीनो अम्ल के जुड़ने का स्थान)

यह OH समूह विशिष्ट एमीनो अम्ल के साथ संयुक्त होता है और इसे m-RNA तक ले जाता है। m-RNA और t-RNA के बीच जटिल को एक अन्य प्रकार के RNA जिसे राइबोसोम ( Ribosome) RNA कहते हैं. द्वारा स्थिर किया जाता है। एमीनो अम्ल को स्थानांतरण करने के बाद – RNA वापस जाने के लिए मुक्त हो जाता है और क्रिया दोहराई जाती है। इस प्रकार, एमीनो अम्ल में विशिष्ट क्रम के साथ प्रोटीन उत्पन्न हो जाती है। किसी विशिष्ट प्रोटीन के संश्लेषण का संकेत DNA में निहित है। DNA के न्यूक्लिओटाइडों के क्रम से ही प्रोटीनों के एमीनो अम्लों के क्रम का निर्धारण हुआ। DNA के इस क्रम को जीन (gene) कहते हैं और जीव कोशिकाओं में प्रत्येक प्रोटीन का अपना एक विशिष्ट जीन होता है। न्यूक्लिओटाइड त्रियक व एमीनो अम्लों के संबंध को जैव उत्पत्ति संकेत या जेनेटिक कोड (genetic code) कहते हैं।

जेनेटिक कोड (genetic code) की चार मान्य विशेषताएँ हैं—

(i) यह सार्वत्रिक है

(ii) यह विकृत है। इसका अर्थ है कि एक से अधिक कोडोन एमीनो अम्ल के लिए कोड का कार्य कर सकते हैं।

(iii) यह अल्प विराम रहित है।

(iv) कोडोन का तीसरा क्षार कम विशिष्ट है। कोडोन के प्रथम दो क्षार अधिक महत्त्वपूर्ण है। कोशिकाओं में प्रोटीनों के संश्लेषण की प्रक्रिया अत्यंत द्रुत गति से संपन्न होती है और एक सेकंड में लगभग 20 एमीनो अम्ल जुड़ जाते हैं। के 1 मिनट जंतुओं के शरीर में रेडियोएक्टिव एमीन इंजैक्ट (inject) करने बाद, रेडियोएक्टिव प्रोटीन बन सकती है।


6.जेनेटिक इंजीनियरिंग और जैव तकनीक के क्या-क्या अनुप्रयोग हैं ?

उत्तर ⇒ यद्यपि विकास के प्रारंभिक स्तर पर जेनेटिक इंजीनियरिंग और जैव तकनीकी का क्षेत्र विकसित है, फिर भी मनुष्य के स्वास्थ्य के क्षेत्र में और दवाइयाँ कृषि और उद्योग में इनका योगदान महत्त्वपूर्ण है

 (i) जेनेटिक इंजीनियरिंग की सहायता से अनेक जेनेटिक व्यतिक्रम (disorder) को आरंभिक अवस्था में पहचानना और इलाज करना संभव हुआ है।

(ii) बहुत से जैव तकनीकी उत्पाद दवाइयों के रूप में प्रयोग किए जाते हैं। उनमें से कुछ नीचे दिए गए है

(a) मानव इंसुलिन हार्मोन – मधुमेह के उपचार के लिए उपयोग किया जाता है।

(b) इंटरफेरॉन (Interferon) वायरस रोधी के रूप में।

(c) रक्त थक्का कारक (Blood clotting factor VIII) हीमोफिलिआस के उपचार में।

(d) टीके (Vaccines) कई संक्रामक रोगों के निदान में।

(iii) कई बैक्टीरिया तथा सूक्ष्म जीवाणुओं में भी जेनेटिक इंजीनियरिंग की सहायता से जीन परिवर्तन किया जा चुका है, जिससे ये कई उपयोगी प्रक्रियाएँ संपन्न करते हैं।

(iv) इनकी सहायता से कच्चे पदार्थों से उपयोगी पदार्थों को प्राप्त किया जा सकता है। प्रदूषण को रोका जा सकता है। (v) कृषि क्षेत्र में पौधों के रोगों से लड़ने की प्रतिरोधकता बढ़ाकर फसलों को उन्नत किया जा सकता है। स्वास्थ्य और रासायनिक उद्योग में भी जेनेटिक इंजीनियरिंग की सहायता से सूक्ष्म जीव विशिष्ट कार्य कर सकते हैं।


12th Biology Hindi Medium Questions 2024

7.पुनर्योगज डीएनए प्राप्त करने के लिए कौन-कौन सी विधियाँ प्रयोग में लाई जाती हैं? वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ पुनर्योगज DNA प्राप्त करने के लिए तीन विधियाँ प्रयुक्त की गई है

(अ) DNA की दो श्रृंखलाओं के अंतिम छोर पर नई DNA श्रृंखलाएँ जोड़कर- यदि हम एक DNA के सिरे पर कुछ क्षारक (जैसे TTTTT) जोड़ दें, तथा दूसरे DNA के सिरे पर इसके संयुग्मी क्षारक (AAAAAA) जोड़ दें और फिर इन दोनों प्रकार के DNA को मिलायें, तो नई लड़ियाँ आपस में H-bond बनाकर दो भिन्न DNA अणुओं को संयुक्त कर देगी। इस कार्य के लिए विशेष एंजाइम का उपयोग किया जाता है जिसे टर्मिनल ट्रासफरेज (terminal transferase) कहते है। अनजुड़े स्थानों को डीएनए लाइगेज (DNA ligase) नामक एंजाइम द्वारा भर देते हैं।

(ब) नियंत्रण एंजाइमों की सहायता से (With the help of restriction enzymes ) – इस विधि में संयुग्मी क्षारकों के बीच हाइड्रोजन बंध बनाकर संकरित DNA का निर्माण करते हैं। परन्तु इस विधि में एक विशेष एंजाइम, नियंत्रण एंजाइम (restriction enzyme) का उपयोग करते हैं। इस प्रकार के लगभग 100 एंजाइम अब उपलब्ध है। ये एंजाइम चाकू की तरह कार्य करते हैं तथा DNA श्रृंखला को विशिष्ट स्थानों पर इस प्रकार से काट देते हैं कि वांछित जीनों वाले खंड प्राप्त हो सके।

उदाहरण के लिए ई. कोलाई से ईको आर आई (Eco RI) नामक नियंत्रण एंजाइम पृथक किया गया है। यह DNA अणु में धारकों के निम्न क्रम को पहचान कर उसे क्षारक G तथा A के मध्य काट देता है –

भिन्न-भिन्न स्रोतों से प्राप्त दो DNA के टुकड़ों को मिला दिया जाए तो संयुग्मी बेस आपस में हाइड्रोजन आबंध बनाकर द्विकुंडलित रचना बना लेते हैं। जो स्थान बिना जुड़े रहते हैं, उन्हें DNA लाइगेज की सहायता से जोड़ लिया जाता है, जैसा कि पहली विधि में किया गया था। स्पष्ट है कि Eco RI तथा DNA ligase की सहायता से विभिन्न जीवों के जीनों को संयुक्त कराके संकरित जीन तैयार किये जा सकते हैं। संकरित जीन में दोनों ही जीवों के गुण उपस्थित होंगे। यहाँ तक कि ऐसे जीव, जिनमें कोई समानता नहीं है (हाथी और मनुष्य, चूहा और बंदर, टमाटर और आम इत्यादि। यही नहीं, पौधों और जंतुओं के बीच भी संकरण की संभावना बढ़ गई।

(स) क्लोनिंग (Cloning)—यह विधि सबसे अधिक सरल तथा उपयोगी सिद्ध हुई है। आप जानते हैं कि कोशिकाओं में DNA का प्रतिकृतिकरण होता रहता है। परन्तु यह भी तभी होता है, जब स्वयं जीन इसका आदेश देता है। कोशिका में इन प्रतिकृतिकरण जीनों की संख्या बहुत कम होती है। जैसे कुछ जीवाणुओं के गुणसूत्र में 300-500 तक जीन होते हैं, परन्तु प्रतिकृतिकरण जीन केवल एक ही होता है। इस जीन की एक विशेषता यह भी है कि यदि इसे मूल DNA से अलग करके किसी दूसरे DNA के साथ जोड़ दिया जाए तो यह उसकी प्रतिकृति करने लगता है। जीवाणुओं के प्लाज्मिड (plasmid) में भी यह जीन उपस्थित होता है। यही कारण है कि जिन जीवाणु कोशिकाओं में प्लाज्मिड होता है, वे तेजी से गुणन करती है।

शरीर में प्रत्येक पदार्थ के संश्लेषण के लिए कोई निश्चित जीन उत्तरदायी होता है। यदि इस विशिष्ट जीन के साथ प्लाज्मिड के साथ पहले बताई विधियों द्वारा संकरित करा दिया जाए और इस संकरित DNA को पुनः जीवाणु की कोशिका में स्थापित करके उपयुक्त संवर्धन माध्यम में उगने दिया जाए, तो जीवाणु में वह जीन उसी पदार्थ का संश्लेषण करता है जो कि वह मूल शरीर में करता था। इस समस्त प्रक्रिया को क्लोनिंग (cloning) कहते हैं। पोषी जीवाणु के लिए ई. कोलाई का उपयोग किया जाता है।


8.डीएनए खंड का पृथक्करण एवं विलगन कैसे किया जाता है ?

उत्तर ⇒ डीएनए खंड का पृथक्करण एवं विलगन—प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज द्वारा डीएनए को काटने के परिणामस्वरूप डीएनए का खंडन हो जाता है। इन खंडों को एक तकनीक द्वारा अलग कर सकते हैं जिसे जेल वैद्युत का संचलन (इलेक्ट्रोफोरेसिस) कहते हैं। चूंकि डीएनए खंड ऋणात्मक आवेशित (चार्जड) अणु होते हैं, इसलिए इन्हें विद्युत क्षेत्र में माध्यम / आधात्री द्वारा ऐनोड की तरफ बलपूर्वक भेजकर अलग कर सकते हैं। आजकल बहुत ही सामान्य रूप से उपयोग किया जाने वाला माध्यम, ऐगारोज है जो समुद्रीय घास (सी वीडस) से निकाला गया एक प्राकृतिक बहुलक (पॉलिमर) है। डीएनए खंडों को ऐगारोज जेल के छलनी प्रभाव द्वारा उनके आकार के अनुसार अलग करते हैं। इस कारण खंड जितने छोटे आकार के होंगे, वे उतने अधिक दूर तक जायेंगे।

पृथक्कृत डीएनए खंडों को तभी देख सकते है जब इस डीएनए को इथीडियम ब्रोमाइड नामक यौगिक से अभिरंजित कर पराबैंगनी विकिरणों से अनावृत्त करते हैं। (आप शुद्ध डीएनए खंडों को दृश्य प्रकाश में बिना अभिरंजित किए नहीं देख सकते ) इथीडियम ब्रोमाइड अभिरंजित (स्टेन्ड) जेल को पराबैंगनी प्रकाश से अनावृत्त करने पर डीएनए की चमकीली नारंगी रंग की पट्टी दिखाई पड़ती है (चित्र) । डीएनए की पृथक्कृत पट्टियों को ऐगारोज जेल से काट कर निकालते हैं और जेल के टुकड़ों से निष्कर्षित (एक्सट्रेक्ट) कर लेते हैं। इस प्रक्रिया को क्षालन (इलूसन) कहते हैं। इस तरह से शुद्ध किए गए डीएनए को क्लोनिन संवाहक से जोड़कर, पुनर्योगज डीएनए निर्माण में उपयोग किया जाता है। हिंड II, डीएनए अणु को उस विशेष बिंदु पर काटते हैं जहाँ पर छह क्षारक युग्मों (बेस पेयर) का एक विशेष अनुक्रम होता है। इस विशिष्ट क्षारक अनुक्रम को हिंड II, की पहचान अनुक्रम कहते हैं। हिंड II, के अलावा आज 900 से अधिक प्रतिबंधन एंजाइमों के बारे में जानकारी है जो जीवाणुओं के 230 से अधिक प्रभेदों (स्ट्रेस) से पृथक किए गए हैं, जिनमें से प्रत्येक विभिन्न पहचान अनुक्रमों को पहचानते हैं।

इन एंजाइमों के नामकरण में परंपरानुसार नाम का पहला शब्द वंश व दूसरा एवं तीसरा शब्द प्राकेंद्रकी कोशिकाओं की जाति से लिया गया है, जिनसे ये पृथक् किए गए थे। जैसे—ईको आर I (Eco RI) एशरशिया कोलाई आर वाई A13. ईको आर I में वर्ण आर (R) प्रभेद के नाम से लिया गया है। नाम के बाद रोमन अंक उस क्रम को दर्शात है जिसको जीवाणु के प्रभेद से एंजाइम पृथक् किए गए थे।

प्रतिबंधन एंजाइम, न्यूक्लिएज कहलाने वाले एंजाइमों के बड़े वर्ग में आते हैं। एक्सोन्यूक्लिएज दो प्रकार के होते है—एक एंडोन्यूक्लिएज एक्सोन्यूक्लिएज डीएनए के सिरे से न्यूकियोटाइड को अलग करते हैं. जबकि एंडोन्यूक्लिएज डीएनए को भीतर विशिष्ट स्थलों पर काटते हैं। प्रत्येक प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज डीएनए अनुक्रम की लंबाई भी निरीक्षण के बाद कार्य करता है। जब यह अपनी विशिष्ट पहचान अनुक्रम पा जाता है तब डीएनए से जुड़ता है तथा द्विकुंडलिनी की दोनों लड़ियों को शर्करा- फॉस्फेट आधारस्तंभों में विशिष्ट केंद्रों पर काटता है (चित्र) प्रत्येक प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज डीएनए में विशिष्ट पैलौन्डोमिक न्यूक्लियोटाइड अनुक्रमों को पहचानता है।


 9.पैलिड्रोम क्या है? इनका क्या कार्य है ? ये कैसे कार्य करते हैं? सचित्र वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒

ये वर्णों के समूह है जिन्हें आगे व पीछे दोनों तरफ से पढ़ने पर एक ही शब्द बनता है जैसे ‘मलयालम’ शब्द पैलिड्रोम और डीएनए पैलिड्रोम में अंतर है। डीएनए में पैलिड्रोम क्षारक युग्मों का एक ऐसा अनुक्रम होता है जो पढ़ने के अभिविन्यास को समान रखने पर दोनों लड़ियों में एक जैसे पढ़ा जाता है। उदाहरणार्थ- निम्न अनुक्रमों को 5′ 3′ दिशा में पढ़ने पर दोनों लड़ियों में एक जैसा पढ़ा जाएगा। अगर इसे 3 5′ दिशा में पढ़ा जाए तब भी यह बात सही बैठती है।

5 जी ए ए टी टी सी -3′

             (GAATTC)

3  सी टी टी ए ए जी- 5′

             (CTTAAG)

 प्रतिबंधन एंजाइम डीएनए लड़ी को पैलिड्रोम स्थल के केंद्र से दूरी पर लेकिन विपरीत लड़ियों में दो समान धारकों के बीच काटते है। जिसके फलस्वरूप सिरों पर एक लड़ीय भाग रह जाता है। प्रत्येक लड़ी में प्रलंबी फैलाव मिलते है जिन्हें चिपचिपा (सिटकी) सिरा कहते है (चित्र)। इसे यह नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि यह अपने पूरक कटे प्रतिरूप के साथ हाइड्रोजन आबंध (बॉन्ड) बनाते हैं। सिरों का यह चिपचिपापन एंजाइम डीएनए लाइगेज के कार्य में सहायता प्रदान करता है। प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज का उपयोग आनुवंशिक इंजीनियरिंग में डीएनए के पुनर्योगज अणु बनाने में किया जाता है जो विभिन्न स्रोतों या जीनोमों से प्राप्त डीएनए से मिलकर बना होता है। एक ही प्रतिबंधन एंजाइम द्वारा काटने पर प्राप्त होने वाले डीएनए खंडों में समान प्रकार के ‘चिपचिपे सिरे’ होते हैं, जो डीएनए लाइगेज की सहायता से आपस में (किनारे से किनारा) जुड़ जाते हैं। आप पूर्ण रूप से समझ चुके होंगे कि सामान्यतः जब तक संवाहक व स्रोत डीएनए एक ही प्रतिबंधन एंजाइम द्वारा नहीं काटे जाते हैं तब तक पुनर्योगज संवाहक अणु का निर्माण नहीं हो सकता है।


10.क्लोनिंग संवाहक क्या है? pBR 322 का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ जीनी अभियान्त्रिकी के दूसरे चरण में वांछित जीन को किसी अन्य जीव के DNA अणु को जोड़कर पुनर्संयोजी अणु का निर्माण किया जाता है। जिस DNA अणु में वांछित जीन को जोड़ते हैं उसे वाहक कहते हैं। वाहक का चयन अग्रलिखित लक्षणों के आधार पर करते हैं

(a) यह माप में छोटा होना चाहिए।

(b) इसमें निबंधन अंतः न्यूक्लिऐज एन्जाइम की क्रिया के लिए कहीं पर वैसा ही एक विलोमपद होना चाहिए, जैसे विलोमपदों पर दाता जीव के DNA अणुओं का विखण्डन हुआ है।

(c) इसमें वांछित जीन को अपने में निवेशित कर लेने की क्षमता होनी चाहिए।

(d) इसमें किसी ऐसी पोषद कोशिका में घुसने और इसमें टिके रहने की क्षमता होनी चाहिए जिसमें कि यह स्वतन्त्र रूप से तीव्र द्विगुणन द्वारा अपनी अनेक प्रतिलिपियाँ बना सके। वाहक DNA अणुओं के रूप में मुख्यतः प्लास्मिड्स तथा जीवाणुओं को संक्रमित करने वाले, अर्थात् टीरियोफेज विषाणुओं के DNA अणुओं का उपयोग किया जाता है। प्लास्मिड्स का उपयोग अधिक व्यापक रूप से किया जाता है।

आधुनिक वैज्ञानिक ने जीवाणुओं के विविध प्लास्मिड्स के खण्डों को जोड़कर कृत्रिम पुनर्संयोजित वाहक प्लास्मिड्स बनाए हैं। ऐसे ही एक कृत्रिम प्लास्मिड को pBR 322 का संकेताक्षर दिया गया है। जीनी अभियांत्रिकी में कृत्रिम प्लास्मिड्स का विशेषतः pBR 322 का व्यापक उपयोग किया जाता है।

PBR 322 में विभिन्न निर्बंधन स्थल (restriction sites Hind III, Eco RI, Bam HI, Sal I, PuvII, Pst I, Cla I), प्रतिजैविक प्रतिरोधी जीन्स (antibiotic resistance genes-amp, tet”) है तथा rop प्लास्मिड के प्रतिलिपीकरण में प्रयुक्त होने वाले प्रोटीन्स के लिए कोड है।

                जन्तुओं एवं पादप कोशिकाओं में विषाणुओं का व्यापक संक्रमण होता रहता है। अतः जीनी अभियांत्रिकी के लिए वाहकों के रूप में विषाणुओं के DNA अणुओं का चयन किया जाता है।

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Class 12th Biology – Objective 
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Abhi Kumar

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